वाह री! संतान आज की 

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जिस माँ ने आँचल में रखकर,

दुनिया उसे दिखाई थी।

हर खुशी अपने हिस्से की,

सुत पर सदा लुटाई थी।।

 

जिसके जरा से रोने पर,

माँ ने सीने से चिपकाया।

नन्हे पग डगमग होने पर,

माँ ने गिरता हुआ उठाया।

 

वही पुत्र जब बना नशेड़ी,

ममता भी पहचान न पाया।

मात्र साठ रुपयों की ख़ातिर,

उसने रिश्ता ही ठुकराया।

 

होश गवाँ बैठा सुत अपना,

नशा हुआ ममता से भारी।

उस कपूत ने उठा कुल्हाड़ी,

माँ की गर्दन पर दे मारी।

 

हिंसक बना क्रोध में ऐसा,

माँ के तन को बना दी लाश।

शायद आत्मग्लानि से बैठा,

वह दो घण्टे लाश के पास।।

 

वाह री! संतान आज की,

जरा नहीं सकुचाती है।

जीवनदाता पिता व माता,

को ही मार गिराती है।

 

माँ के ऋण का मोल न कोई,

माँ अनमोल धरोहर है।

माँ के चरणों में ही जीवन,

माँ जग का सुंदर स्वर है।

 

नशा सिर्फ धन ही न खाए,

नशा विवेक भी हरता है।

नशे का आदी उन्मादी नर,

नशे में काम गलत करता है।

 

अमर सिंह राय

नौगाँव, मध्य प्रदेश

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