भाद्रपद शुक्ल की पंचमी को, यह पावन पर्व मनाया जाता,
सप्तर्षियों के चरणों में, श्रद्धा से शीश नवाया जाता।
कश्यप, अत्रि, भारद्वाज और विश्वामित्र का ध्यान धरे,
गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ मुनि के, तप का स्मरण मन करे।
जाने-अनजाने में जो भी, रजस्वला दोष कभी बन जाए,
काया और अंतःकरण की, हर अशुद्धि जिससे धुल जाए।
अपामार्ग और पावन जल से, तन का पावन स्नान किया,
सप्त मुनियों की साधना को, हृदय से पूरा मान दिया।
हल से जोते अन्न को त्यागे, सात्विक भोजन ग्रहण करे,
व्रत और संयम के नियमों से, जीवन में पुण्य का बीज भरे।
यह पर्व नहीं केवल पूजा, आत्म-शुद्धि का संकल्प महान,
पापों से मुक्ति का मार्ग, सनातन का यह अनुपम वरदान।
ऋषियों के चरणों में झुककर, पाएँ सत्कर्मों का आशीष,
ऋषि पंचमी हर लेती है, मन की हर कलुषता और क्लेश।
नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)






