सरायें में रहते हो फिर काहे का गुमान करते हो
माटी की कच्ची मटकी पर अभिमान करते हो
ये पानी का बुलबुला पता नहीं कब फूट जाये
धरोहर सब साथ ले जाने का अरमान करते हो
सरायें में रहते —–
मिथ्या पल है मिथ्या जीवन मिथ्या है जग सारा
बिन पतवार की बहती किश्ती को न मिले किनारा
काया माया मोह भरम सब त्याग करो हित अपना
ये तेरा ये मेरा के भ्रम में क्यों धरती आसमान करते हो
सरायें में रहते ,——
नहीं लगाम है आती जाती श्वांसा कि कब रुक जाये
नहीं पता हाड़ मांस की सुंदर काया कब थक जाये
छोड़ कर जाना होगी ये सरायें चार कांधे पर लदकर
दो पल की जिंदगानी में क्यों न राम नाम सुमरते हो
सरायें में रहते हो फिर काहे का गुमान करते हो।
सुभाष हेमबाबू
महोबा
पानी का बुलबुला
Date:






