बिहार की माटी का अनमोल कलारत्न: संघर्षों की भट्टी में तपकर कुंदन बने प्रद्युम्न कुमार

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  1. गया/बिहार

    ईश्वर द्वारा निर्मित कुछेक व्यक्तित्वों के जीवन का प्रत्येक अध्याय संघर्ष, साहस और अटूट आत्मविश्वास की एक जीवंत महागाथा होता है। बिहार के गया जिले के फतेहपुर की माटी में जन्मे युवा कलाकार श्री प्रद्युम्न कुमार एक ऐसा ही दैदीप्यमान नाम हैं। प्रद्युम्न कुमार की कला-यात्रा आज किसी औपचारिक परिचय की मोहताज नहीं है, बल्कि वह देश के उन असंख्य युवाओं के लिए प्रेरणा का एक पावन दीप है जो घोर अभावों और सीमित संसाधनों के बीच भी अपने सपनों को पलकों पर सजाने का अदम्य साहस रखते हैं।
    एक साधारण शिक्षक के परिवार में जन्मे प्रद्युम्न कुमार को बचपन से ही नृत्य, संगीत और अभिनय की दैवीय सौगात मिली हुई थी। विद्यालय के वार्षिकोत्सवों से लेकर स्थानीय सांस्कृतिक मंचों तक, उन्होंने जहाँ भी कदम रखे, उसे अपनी साधना का पवित्र गर्भगृह बना लिया।
    अभावों की कँटीली राहें और कला की अनवरत साधना
    प्रतिभा का मार्ग कभी भी निष्कंटक नहीं होता। मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात जब वे कला की विधिवत शिक्षा के लिए गया शहर पहुँचे, तो नियति ने उनकी कठिन परीक्षा ली। नृत्य कक्षा में प्रवेश के लिए जेब खाली थी। किंतु सपनों की तपन इतनी तीव्र थी कि उन्होंने एक मित्र से पैसे उधार लेकर नृत्य का ककहरा सीखना शुरू किया। कला के प्रति इसी समर्पण का प्रतिफल था कि कुछ ही वर्षों में वे उसी कक्षा में विद्यार्थी से शिक्षक के गौरवशाली पद पर आसीन हो गए। बाद में उन्होंने प्रयागराज संगीत महाविद्यालय से शास्त्रीय नृत्य में स्नातक (ग्रेजुएशन) की उपाधि प्राप्त कर अपनी सहज कला को एक सुदृढ़ शैक्षणिक आधार भी प्रदान किया।
    जीवन के झंझावातों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उनका विवाह हुआ, किंतु गृहस्थी के दायित्वों के बीच भी उनकी कलात्मक जिजीविषा कभी धूमिल नहीं हुई। इसी बीच वैश्विक महामारी कोरोना काल का वज्रपात हुआ। नृत्य कक्षाएँ बंद हो गईं, आर्थिक संकट गहराया और किराए का मकान छोड़कर उन्हें वापस गाँव लौटना पड़ा। गया शहर में उनका भौतिक सामान भले ही छूट गया, पर हौसलों की जो अटूट गठरी उनके भीतर थी, उसे वक्त की गर्द भी छू न सकी।
    डिजिटल क्षितिज पर अभूतपूर्व सफलता का शंखनाद
    समय ने साधन छीने थे, साधना नहीं; परिस्थितियों ने रास्ते रोके थे, मगर हौसले डिगा नहीं सकीं। आपदा के इसी घोर अंधकार में डिजिटल संसार उनके लिए संभावनाओं का एक नया सूर्य बनकर उदित हुआ। छोटे-छोटे वीडियो और रील्स बनाने से शुरू हुआ यह सफर तब एक ऐतिहासिक मोड़ पर आ गया, जब उनका एक वॉइसओवर वीडियो देशव्यापी स्तर पर वायरल हो गया। इसके बाद प्रद्युम्न कुमार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
    अपनी अनूठी अभिव्यक्ति और अहर्निश परिश्रम के बल पर उन्होंने दो हजार से अधिक वीडियो का सृजन किया। देखते ही देखते उनका यूट्यूब चैनल 1 लाख से बढ़कर 2.5 मिलियन (25 लाख) सब्सक्राइबर्स के विशाल पड़ाव को पार कर गया। यूट्यूब (YouTube) की ओर से उन्हें ‘सिल्वर प्ले बटन’ और ‘गोल्डन प्ले बटन’ से नवाजा जाना उनकी इस डिजिटल विजय यात्रा की स्वर्णिम गवाही है। जिस कला को लेकर कभी अपनों के मन में संशय के प्रश्न थे, उसी कला ने आज समूचे परिवार को गौरव के आंसुओं और मुस्कान से सराबोर कर दिया।
    विपत्तियों से टकराने का नाम है प्रद्युम्न
    सफलता के इस चरमोत्कर्ष के बीच एक बार फिर नियति ने उन पर क्रूर प्रहार किया। कुछ तकनीकी कारणों और फर्जी कॉपीराइट दावों के चलते उनका लाखों सब्सक्राइबर्स वाला मूल यूट्यूब चैनल अचानक डिलीट हो गया। बरसों की साधना और करोड़ों दर्शकों का आत्मीय जुड़ाव एक पल में छिन जाना किसी भी सर्जक के लिए आत्मघाती पीड़ा जैसा था। परंतु प्रद्युम्न कुमार हार मानने वाले पथिक नहीं थे। उन्होंने शून्य से पुनः शुरुआत की, एक नया चैनल बनाया और बहुत कम समय में 50 हजार से अधिक सब्सक्राइबर्स जोड़कर यह सिद्ध कर दिया कि साम्राज्य छिन सकता है, सम्राट की प्रतिभा नहीं।
    आज प्रद्युम्न कुमार केवल नृत्य तक सीमित नहीं हैं; वे गायन, वीडियो मेकिंग, फिल्म निर्माण, हास्य (कॉमेडी) और डिजिटल मनोरंजन के बहुआयामी फलक पर निरंतर नए प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं।
    मगही भाषा को राष्ट्रीय गौरव दिलाने का महती संकल्प
    इन तमाम सफलताओं के बीच प्रद्युम्न कुमार के हृदय में एक पवित्र स्वप्न निरंतर धड़क रहा है—अपनी मातृभाषा ‘मगही’ को राष्ट्रीय पटल पर एक विशिष्ट पहचान दिलाना। वे मगही को केवल एक क्षेत्रीय बोली के दायरे से बाहर निकालकर उसकी शाश्वत मिठास, लोक संस्कृति और कलात्मक धरोहर को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने के लिए भगीरथ प्रयास कर रहे हैं।
    उनकी इस अनूठी कला-साधना को राष्ट्र ने भी सराहा है। उन्हें अब तक ‘राजू श्रीवास्तव अवार्ड’, ‘लेट्स इंस्पायर बिहार अवार्ड’, ‘हुनरबाज़ सम्मान’ एवं ‘मगही नागरिक सम्मान’ जैसे प्रतिष्ठित अलंकरणों से विभूषित किया जा चुका है। बिहार सरकार के विभिन्न रचनात्मक कार्यों में उनका सक्रिय योगदान उनकी प्रशासनिक और सामाजिक स्वीकार्यता को दर्शाता है।
    कृतज्ञता ज्ञापन और मंगलकामना
    इस अनुपम कलारत्न के जीवन वृत्त को शब्दों में पिरोने का अवसर मिलना किसी भी लेखक के लिए एक अत्यंत सुखद और चेतना को झंकृत करने वाला अनुभव है। लेखक कुमार संदीप ने आदरणीय आर.के. महतो सर (RK Mehto Sir) के प्रति गहरी कृतज्ञता ज्ञापित की है, जिनके सहयोग से यह प्रेरक जानकारी जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम प्रशस्त हुआ।
    बिहार की इस पावन माटी के सजग प्रहरी और हिंदी साहित्य के विनम्र अनुरागी कुमार संदीप (मुजफ्फरपुर) ने प्रभु श्रीराम और ज्ञानदायिनी माँ सरस्वती के चरणों में करबद्ध प्रार्थना करते हुए प्रद्युम्न कुमार के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और यशस्वी जीवन की कामना की है। उन्होंने प्रार्थना की है कि प्रद्युम्न कुमार का यह कला-कर्म बिहार की अस्मिता को वैश्विक पहचान दिलाए और देश के करोड़ों युवाओं के जीवन का मार्ग आलोकित करता रहे।

विशेष रिपोर्ट: कुमार संदीप
(ग्राम- सिमरा, पोस्ट- श्रीकांत, प्रखंड- बंदरा, जिला- मुजफ्फरपुर, बिहार)

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