
कैसे लिखूं मैं बरखा, बादल?
कैसे लिखूँ बसंत बहार?
आहत मन है कैसे लिखूँ ?
ढाई आखर वाला प्यार।
समय आ गया है लिखने का
भ्रष्टाचार, अत्याचार
मौन छोड़ अब भरना होगा
अन्याय के ख़िलाफ हुंकार।
कैसे लिखूँ हरीतिमा?
कैसे लिखूँ मौसम गुलज़ार?
चहुंओर फैली अराजकता
करना होगा अब प्रतिकार।
मौन है हर संवाद
हर बात पर विवाद
कहाँ खो गया आह्लाद?
क्यों हर चेहरे पर छाया है विषाद?
काश बदल जाये फ़िर मौसम
फिजाएं हों जायें खुशगवार
निर्भीक हो गुनगुनाए हर पाखी
भर ले उड़ान वो पंख पसार।
हर्षित मन से फिर मैं लिख दूं
स्नेहिल, स्वप्निल संसार
फ़िर से मेरी कलम लिख दे
ढाई आखर वाला प्यार।






