ऋषि मुनि गुरु सद्गुरु ये,दिव्य ज्ञान दिए हैं बड़ भारी।
सत्यपथ चलने वाले को ये,खुशियाँ मिलती हैं सारी।।
देव-देवी ऋषि मुनिजन को,गुरुवर हैं मानें वे आभारी।
ऋषि पंचमी पर उन्हें शीश,नवाऊँ मैं उनके आभारी।।
जप तप कठिन तपस्या में,मुनिवर स्व ध्यान हैं लगाए।
परमपिता परमेश्वर कृपा से,ऋषियों तब ज्ञान बढ़ाए।।
श्रीराम-श्रीकृष्ण को गुरुकुल में,ऋषि-मुनि ही पढ़ाए।
कृष्ण को संदीपन,वशिष्ठ-विश्वामित्र राम को पढ़ाए।।
बुद्धि विवेक ज्ञान से अपने,वेद पुराण ऋचाएँ रच कर।
सत्य सनातन धर्म साहित्य,शास्त्र ग्रन्थ ये सृजन कर।।
शास्त्र संवत् चलने का वो,मानव का मार्ग प्रशस्त कर।
ऋषियों मुनियों ने है सही,जीवन दिशा ये दिखा कर।।
हमसब मानव प्रजाति को,अपना कृपापात्र है बनाया।
विद्या माँ के कृपा से इंसाँ,इस पथ चल ज्ञान बढ़ाया।।
शिक्षक साहित्यकार कवि,लेखक-सी श्रेणी भी पाया।
व्यर्थ न हो ये मानव तन,धर्म-कर्म-शिक्षा पाठ भाया।।
ऋषि-गुरु प्रति कृतज्ञ होना,ये साधना स्वरूप रूप है।
दिए ज्ञान संयम सदाचार,आचरण ये आदर्श रूप है।।
विनम्रता संवेदना सहानुभूति,मानवता ये सब रूप है।
मूल्य परक शिक्षा ज्ञान,संस्कार चरित्र उत्तम रूप है।।
ऋषि पंचमी में उनके,श्रीचरणों को है शत शत नमन।
श्रद्धावनत बारंबार प्रणाम उन्हें,कोटि कोटि है वंदन।।
ऋषियों मुनियों को करूँ मैं,यह श्रद्धा सुमन समर्पण।
दण्डवत् प्रणाम के चरण रज ले,माथे लगाऊँ चंदन।।
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रचयिता :
*ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.
(शिक्षक कवि लेखक साहित्यकार समीक्षक समाजसेवी)






