नारी मात्रा भार

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नारी तेरी लिखूँ कहानी।

ऐसी मेरी औकात नहीं।

तू अबला हो भोली भाली।

ऐसा मुझको तो भान नहीं।

 

बनकर लक्ष्मी बाई तू फिर

अंग्रेजों को मार भगाती हो।

अनसूया बनकर देवो को,

नित पालने में झुलाती हो।

 

जन्म लिया है धरा गोंद से,

तब सीता माँ कहलातीं हो ,

हरण किया जब था रावण ने

तब लंका जल मिट जाती है।

 

तू कालरात्रि माँ काली हो

असुरों का बध कर देती हो

बन रणचंडी तलवार उठा,

नर से बनी नारायणी हो।

 

अबलाओ का चीरहरण जो

दुष्ट कभी करते रहते जो

सजा कठिन ही अब देना है,

सिर काट अलग कर देना है।

 

हे देवी तुम पूज्य रूप हो

भाव अतिरेक मत होना है

बन एक बार फिर रणचंडी

तलवार उठा अब हाथों में।

 

दुश्मन देखें थरथर कांपे

भूले से फिर हाथ न थामें।

ऐसी ताकत भरो हृदय में।

धीर धरो फिर से तुम मन में।।

 

डॉ जगदीश नारायण गुप्त

“जगदीश”

बनारस✍️✍️

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