आँगन में फिर धूप उतरी है,
यादों की पगडंडी से होकर,
कुछ अपने लौटे हैं मन में,
मौन खड़े हैं आँखें धोकर।
जिन हाथों ने हमें सँभाला,
जिन चरणों ने राह दिखाई,
जिनकी छाया में जीवन ने
हर मुश्किल से लड़ी लड़ाई।
आज नहीं वे पास हमारे,
फिर भी कितने पास हैं मन में,
उनकी बातें, उनके संस्कार
साँस-साँस बसते जीवन में।
पिंड नहीं केवल अर्पित होता,
अर्पित होती श्रद्धा सारी,
जल की हर इक बूँद कहे है—
आपकी ऋणी है दुनिया हमारी।
जो देकर गए प्रेम की पूँजी,
वही हमारी सच्ची थाती,
उनके पुण्य-स्मरण से जगती
जीवन में फिर नई प्रभाती।
श्राद्ध नहीं केवल विधि-विधान है,
यह तो ऋण स्वीकारने का क्षण है,
जिनसे मिली हमें जीवन-ज्योति,
उनको नमन ही सच्चा तर्पण है।
हे पितरों! जहाँ कहीं भी हों,
आपकी कृपा बनी रहे,
हममें आपके श्रेष्ठ संस्कारों की
अविरल ज्योति जली रहे।
*दया भट्ट दया खटीमा( उत्तराखंड)*






