गोधूलि दिन और रात के बीच का वह शांत क्षण है, जब लौटती गायों की धूल, घोंसलों को लौटते पंछी और जलता दीप जीवन के ढ़लते समय में भी उजाले का आश्वासन देतें हैं।
जीवन भी ऐसी ही यात्रा है,बाल्यकाल भोर, यौवन दुपहरी और वृद्धावस्था गोधूलि। इस बेला में मनुष्य पीछे मुड़कर अपने संघर्षों, उपलब्धियों, बिछोहों और अधूरे स्वप्नों को देखता है। बाहरी चमक मंद पड़ने पर भीतर का आकाश दिखाई देने लगता है और समझ आता है कि सच्ची मंज़िल बाहर नहीं, भीतर की शांति में थी। झुर्रियाँ जीवन की इबारत और सफ़ेद बाल बीती ऋतुओं की चाँदनी बन जातें हैं। फ़िर प्रश्न उठता है,क्या जीवन सचमुच बीत गया? शायद नहीं, क्योंकि मनुष्य अपने प्रेम, संस्कार, शब्दों और कर्मों में जीवित रहता है। किसी को दिया विश्वास, मुस्कान या सहारा उसकी अनुपस्थिति में भी दीप की तरह जलता रहता है। इसलिए गोधूलि मृत्यु की छाया नहीं, अर्थ की अंतिम रोशनी है, जो कहती है कि अब कुछ सिद्ध या पाने की जल्दी नहीं; अब प्रेम कहने, क्षमा माँगने, दूसरों को क्षमा करने और कृतज्ञ होने का समय है। क्योंकि अनकहें शब्दों का पछतावा सबसे गहरा होता है।
गोधूलि कहती है,ढलते सूर्य की तरह शांत हों, लौटते पंछी की तरह भीतर आएँ और अहंकार छोड़कर अपने जीवन में उजास बाँटें।
-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’






