जब पीछे मुड़कर देखा मेरा सच

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जब पीछे मुड़कर देखा, मैंने तो एक नया सवेरा पाया,

झूठ के सारे बादल छंट गए, सच का सुंदर रूप दिखाया।

बीते कल की धुंधली यादें, अब बिल्कुल साफ दिखाई देती हैं,

वो सारी बातें, वो सारे किस्से, आज नई गवाही देती हैं।

 

खोया था जिस भ्रम की दुनिया में, वो रेत का एक महल निकला,

वक्त की तेज हवाओं में, जो पल भर में ही बदल निकला।

चेहरों पर जो मुखौटे थे, वो वक्त ने सारे उतार दिए,

सच के सीधे-साधे रास्तों ने, जीवन के मायने संवार दिए।

 

ठोकरें जो खाईं थीं राहों में, उन्होंने ही मुझको संभाला था,

अंधेरे रास्तों से निकाल कर, मुझे रोशनी में डाला था।

गलतियां जो की थीं अनजाने में, आज सीख बनकर सामने आईं,

पीछे मुड़ने पर ही समझ आया, क्यों आई थीं वो तन्हाइयाँ।

 

अब न कोई शिकवा है दिल में, न कोई बाकी पछतावा है,

सच को अपना लेने के बाद, जीवन कितना सादा है।

पीछे देखना व्यर्थ नहीं, अगर सीख वहां से मिल जाए,

सच्चाई को स्वीकार करो, तो खुद ही जीवन खिल जाए।

 

स्वरचित एवं मौलिक

संगीता वर्मा

कानपुर उत्तर प्रदेश

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