फुआ के आँगन की वह यादें पुरानी,
जहाँ सजती थी जितिया की सुंदर कहानी।
झोड़-भात का स्वाद और गोतिया का मेला,
आशीर्वाद माँगता था हर कोई अकेला।
सबके दिल में बस एक ही आस थी छाई,
हमारे घर भी जिमुतवाहन की कृपा क्यों न आई?
फिर वो मंगल घड़ी आई, खुशियों का वरदान मिला,
छोटी बहन पूजा के रूप में घर को एक नया मान मिला!
तुम्हारे आने से घर में जितिया का पावन व्रत शुरू हुआ,
पूरे गोतिया परिवार पर जिमुतभान का सच्चा आशीर्वाद हुआ।
याद है मुझे वो शाम, जब सूजी का हलवा थाली में सजता था,
माँ के हाथों का वो प्यारा ‘केक’ हर जन्मदिन पर कटता था।
आज वक्त बदला, पर तुम्हारी ममता और संस्कार नहीं बदले,
अब तुम भी अपनी बेटी के लिए जितिया का निर्जला व्रत रखने लगी।
जनमदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ, मेरी प्यारी छोटी बहन पूजा!
जिमुतवाहन देवता का आशीर्वाद तुम पर और तुम्हारी बेटी पर सदा बना रहे।
कवयित्री ज्योति बरनवाल, नवादा (बिहार)






