असली कमाई जीवन की इस कठिन राह पर

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एक मोड़ पर समझ यह आई।

आज तलक जो भाग-दौड़ कर,

अकूत संपत्ति हमने कमाई—

अंतिम क्षण में किसी काम न आई,

सब माटी समान है भाई!

 

सबकुछ जब समाप्त होने को आया,

तब जा कर यह बोध समाया।

जिस धन को सहेजने-संवारने में,

हमने व्यर्थ ही समय गंवाया—

 

काश! वही पल किसी की सेवा में,

दुख-दर्द हरने, खुशियाँ बाँटने में,

दो मीठे बोल बोलने में बिताया होता,

तो आज मन में यह पछतावा न होता भाई!

 

बेहिसाब जायदाद बटोरने की लालसा ने,

बस पुलिस, ईडी और आयकर को राह दिखाई।

शान-ओ-शौकत, शोहरत और दौलत—

सब हाथ से छूट जाने के बाद,

यह कड़वी सच्चाई समझ में आई।

 

अफ़सोस यही है कि देर से समझ आई—

चेहरों पर मुस्कुराहटें लाना,

सच्चा आनंद बरसाना,

और किसी का दिल न दुखाना,

यही तो जीवन की असली कमाई थी।

 

बाकी तो यह धन, दौलत, शोहरत सब,

माटी के मोल समान ही है भाई!

न जाने क्यों, यह बात पहले समझ न आई!

 

ललन प्रसाद सिंह , वसंत कुंज, नई दिल्ली-70

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