मैंने मन के बंद दरवाजे,
आज सभी खोल दिए।
जो सपने वर्षों से चुप थे,
उनको फिर से बोल दिए।
अब न डर न कोई चिंता,
मुझे कभी सताती है।
उम्मीदों से भरे मेरे मन को,
आजादी बहुत भाती है।
गिरना भी अब हार नहीं,
ठोकर भी उपहार बनी।
टूटे पंखों ने मेरे आखिर,
उड़ने की पहचान चुनी।
आंधी से अब डर नहीं लगता,
आंखों में उम्मीदें मन में विश्वास।
मेरे मन में एक आजादी,
और हृदय में खुला आकाश।
मैं अपनी कहानी खुद लिखूं,
यही मेरे दिल का हे अरमान।
बंधन चाहे जितने हो दुनिया के,
सदा मेरे सपनों का हो सम्मान।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।






