सुप्रसिद्ध कवि डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ की सद्य प्रकाशित पुस्तक “कवनीत-कुंज” (छंदबद्ध गीत-संग्रह) की समीक्षा करने का प्रयास मैने किया है, जो निम्नवत् है।
1. पुस्तक का मूल स्वर और दर्शन
“कवनीत-कुंज” का मूल स्वर “संयोजन” का है – परंपरा और आधुनिकता, प्रकृति और समाज, भक्ति और लोकजीवन, व्यक्तिगत भाव और सामूहिक चेतना का संयोजन।
डॉ गुंजन ने भूमिका में ही स्पष्ट कर दिया है: _”कवनीत का अर्थ है कवि, कविता व काव्य-सौष्ठव तथा कुंज का अर्थ बाग या बल्लरी है।”_
यानी यह सिर्फ गीतों का संग्रह नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित काव्य-उद्यान है। यहाँ हर गीत एक फूल है – कहीं ऋतु का, कहीं भक्ति का, कहीं क्रोध का, कहीं करुणा का, कहीं जीवन-दर्शन का, कहीं देशभक्ति का तो कहीं नारी सशक्तिकरण का।
इसका दर्शन स्पष्टतः “सदाचार, समरसता और समर्पण” पर आधारित है। 50+ गीतों में कहीं भी अश्लीलता, नकारात्मकता या निराशावाद हावी नहीं होता है। यहाँ तक कि “बध कर अब दुःशासन का” जैसे आक्रोश वाले गीत में भी समाधान “सदाचार” में बताया गया है।
2. छंद और शिल्प: परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा
आज के दौर में छंदबद्ध गीत लिखना सबसे कठिन काम है। डॉ गुंजन ने इसे सहजता और कुशलता से निभाया है।
*छंद विविधता:*
– *लघु छंद*: सार, ललितपद, कुकुभ, चौपाई – ये गीतों को लोकगीत जैसा प्रवाह देते हैं। “घनन-घन घन मेघा बरसे” चौपाई में लिखकर आपने लोकलय पकड़ ली है।
– *दीर्घ छंद*: दुर्मिल सवैया, राधेश्यामी, लावणी – इनमें गंभीर विषयों को जगह मिली है। “मैं भारत हूँ” राधेश्यामी में लिखकर आपको ओज मिला है।
– *मात्राभार आधारित गीत*: 16,16 या 16,14 पर आधारित गीत फिल्मी गीतों की तरह याद रखने में आसान हैं। “सुख-दुख हमको प्यारे हैं” इसका उदाहरण है।
*गेयता:* हर गीत में मुखड़ा-अंतरा-टेक की संरचना है। “सखिल गीत गाया गिरिवर ने” को आप 5 अंतरे तक बिना लय तोड़े ले गए हैं। ये संगीतकारों के लिए सीधा स्क्रिप्ट है।
*भाषा:* खड़ी बोली में ब्रज और अवधी के शब्दों की छटा है – “सखिल”, “अँगना”, “पुरंजय”, “तंद्रिल”। ये शब्द काव्य को मधुरता देते हैं। कहीं भी दुरूह संस्कृतनिष्ठता नहीं है।
3. विषयगत विश्लेषण: चार प्रमुख धाराएँ
A. ऋतु-प्रकृति और पर्यावरण चेतना
यह धारा इस गीत-संग्रह की सबसे सशक्त धारा है।
– शृंगारिक प्रकृति : “खिलने लगा वसंत”, “फागुन आ धमका”, “होली आई” में प्रकृति रस में सराबोर है। “पीली सरसों की बगिया से, हर्षित सभी उदंत” – ये पंक्ति सीधे सूर-केशव की परंपरा से जुड़ती है।
– चिंतनशील प्रकृति : “गौरैया कर गई पलायन”, “काट रहे हो जब पेड़ों को”, “वृक्ष ढूँढ़ते कोमल पल्लव” में आपने पर्यावरण संकट को भावनात्मक बना दिया है। “गौरैया कर गई पलायन” समसामयिक त्रासदी का प्रतीक बन जाता है – गौरैया गायब, सामाजिकता गायब, रिश्ते गायब। बहुत अनूठा प्रयोग है।
B. राष्ट्रीयता और सामाजिक सरोकार
– राष्ट्र गौरव : “मैं भारत हूँ, भारत हूँ मैं” में इतिहास से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक का गौरवगान है। राणा प्रताप, नेताजी, भगत सिंह का उल्लेख युवाओं में राष्ट्रीयता की चेतना भरने के लिए सराहनीय है।
– सामाजिक विसंगति : “बध कर अब दुःशासन का”, “दिल में दीप जलाने वाले” में नारी अस्मत, भ्रष्टाचार तथा वैमनस्य पर चोट है। कविवर गुंजन ने आक्रोश को “दीप जलाओ” जैसे सकारात्मक समाधान में बदला है।
– कोविड काल की झलक : “विश्वास हमारा जीतेगा” में “कोरोना नित फैलाता” जैसी पंक्ति समकालीनता से जोड़ती है।
C. भक्ति और आध्यात्म-
इस संग्रह का एक बड़ा हिस्सा भक्ति को समर्पित है। सरस्वती वंदन, शिवभक्ति, राम-राज्य, “भवसागर अब पार करो” जैसे गीत भक्तिकालीन निर्गुण-सगुण दोनों परंपरा को छूते हैं।
“अपने अंदर के प्रभु को” गीत में आपने निर्गुण भक्ति की बात कही है: _”मानुष तन यह ईश्वर का घर, भगवन का है वास यहाँ”_। यह कबीर-नानक की याद दिलाता है।
D. व्यक्तिगत भाव और जीवन-दर्शन-
– प्रेम-विरह : “मेरा सावन सूना है”, “खामोशी भेजी है खत में” में विरह का सूक्ष्म चित्रण है। बिना फूहड़पन के शृंगार।
– जीवन-दर्शन : “सुख-दुख हमको प्यारे हैं”, “जीवन रूपी कागज पर हम”, “आशाओं के पंख लगाकर” जैसे गीतों में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है। ये गीत मोटिवेशनल स्पीच जैसे लगते हैं, पर काव्यात्मक रूप में।
4. भाषा-शैली की विशेषताएँ
1. अनुप्रास और यमक : “घन-घन घन मेघा बरसे”, “सन-सन पुरवाई डोले” में ध्वनि-सौंदर्य है। ये गीत को कंठस्थ करने में मदद करते हैं।
2. लोकगीत की लय : “होली आई”, “घन गर्जन” पढ़ते ही लगता है जैसे गाँव में होली गाई जा रही हो।
3. संस्कारशील शब्दावली : आपने “नारी अस्मत”, “दुःशासन”, “दुराचार” जैसे शब्दों का प्रयोग किया है, पर भाषा मर्यादित रही है।
5. तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य
आपकी शैली में हरिवंश राय बच्चन की गीतात्मकता, गोपालदास नीरज की सरलता, और सोहन लाल द्विवेदी की ओजस्विता की झलक मिलती है। पर आपने अपनी एक अलग पहचान बनाई है – “गुंजन”। नाम के अनुरूप आपके गीतों में “गुंजन” है – कोमल, मधुर, पर निरंतर।
6. पाठकीय अनुभव और उपयोगिता
यह पुस्तक तीन स्तरों पर काम करती है:
– *सामान्य पाठक* के लिए: सरल भाषा, विविध विषय, पढ़ने में रुचि बनी रहती है।
– *शिक्षक/छात्र* के लिए: छंद, रस, अलंकार पढ़ाने के लिए जीवंत उदाहरण।
– *संगीतकार/गायक* के लिए: गेयता के कारण सीधे मंचन योग्य।
“आओ नवल विहान लिखें”, “आशाओं के पंख लगाकर” जैसे गीत स्कूल-कॉलेज के कार्यक्रमों में तुरंत फिट हो जाएंगे।
7. *समग्र मूल्यांकन*
“कवनीत-कुंज” हिंदी गीत-साहित्य में एक सशक्त, सार्थक, संस्कारशील और समय-सापेक्ष योगदान है। यह पुस्तक साबित करती है कि छंद मर नहीं रहा है, बस उसे नए मन से और नए संदर्भों में कहने वाला चाहिए।
डॉ. गुंजन जी ने “कवनीत-कुंज” के जरिए यह दर्शाया है कि कविता अगर जड़ से जुड़ी हो, तो वो आज भी लोगों के दिलों तक पहुँचती है। यह संग्रह एक “साहित्यिक सत्संग” जैसा है – पढ़ो, गाओ, और खुद को बेहतर बनाओ।
निश्चित रूप से यह पुस्तक संग्रहणीय है।
समीक्षक: पूजा काशीनाथ मुठ्ठे,
पी.एचडी (हिंदी) शोध छात्रा,
डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, छत्रपति संभाजीनगर, महाराष्ट्र-431001






