मुझसे ज़मीर बेच के खाया नहीं गया।
मज़बूर को कभी भी सताया नहीं गया।।
वादा किया तो उसको पूरा किया ज़रूर
पर बेवफा से रिश्ता निभाया नहीं गया।
जिस से गिला हो उसके ही मुँह पर कहा मगर
उल्फत जता के काँटा चुभाया नहीं गया।
दस्तार झूठ की जो पहने हैं शीश पे,
उनसे कभी भी हाथ मिलाया नहीं गया।
चट्टान सी अडिग रही मैं अपनी बात पर
किरदार अपना मुझ से डिगाया
नहीं गया।
नफ़रत का दौर फैला जहांँ में है इस कदर,
कोशिश तमाम कर के मिटाया नहीं गया।
*गीता* ख़ुशी या ग़म के नज़ारे हों हर तरफ़
मुझसे ख़याल रब का भुलाया नहीं गया।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश






