स्वाभिमानी स्त्री

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लोगों ने मुझे तोड़ने की,

हद से ज्यादा कोशिशें की।

मैं टूट कर भी बिखरती नहीं,

आंखें नम हो फिर भी रोती नहीं।

 

लोगों के उसूलों पर सिर झुका कर,

मुझे चलना आता नहीं।

जो मेरे अस्तित्व को महत्व न दे,

उसका साथ मुझे भाता नहीं।

 

मुझे गलत नियमों में बांधना,

किसी के लिए भी आसान नहीं।

मीठी बातों के झांसे में नहीं आती,

ठहरती नहीं जहां मेरा सम्मान नहीं।

 

मैं जिम्मेदारियां निभाती हूं,

पर खुद को खोकर नहीं।

मैं झुक जाती हूं संस्कारों में,

पर किसी से डर कर नहीं।

 

लोग मुझे समझ नहीं पाते,

सबके लिए मैं एक पहेली हूं।

मैं भीड़ से अलग चलती हूं,

मैं खुद ही अपनी सहेली हूं।

 

हर गलत के लिए आवाज उठाना,

मैंने अनुभवों से सीखा है।

अपनी राह उसूल खुद चुनती हूं,

क्योंकि समाज एक धोखा है।

 

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️

अमरावती महाराष्ट्र।

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