बिरसिंहपुर गांँव। यहांँ शाम होते ही अंँधेरा गहरा हो जाता था। हफ्ते में दो दिन बिजली आती, बाकी दिन चौपाल पर टंँगा एक पुराना लालटेन ही पूरे गांँव का उजाला था। उसी की पीली रोशनी में बुजुर्ग हुक्का पीते और पंचायत करते।
इसी गांँव में रामप्रसाद और गायत्री का बेटा आरव पला-बढ़ा। पिता खेती करते, माँ आंगन में तुलसी सींचती। दोनों का सपना था – “बेटा पढ़-लिखकर अफसर बने।”
आरव ने दिन-रात पढ़ाई में एक किया। शहर जाकर IIT की तैयारी की। माँ ने अपने गहने बेच दिए, पिता ने खेत गिरवी रख दिया। 4 साल बाद आरव इंजीनियर बन गया। बेंगलुरु की एक बड़ी कंपनी में 40 हजार की नौकरी लग गई। AC वाला फ्लैट, कार, ऐसो आराम का सब कुछ।
माँ हर रविवार फोन करती – “बेटा कब आएगा?”
आरव टाल जाता – “माँ, प्रोजेक्ट चल रहा है।”
दो साल बीत गए। फिर एक रात फोन आया। माँ की आवाज कांँप रही थी – “बेटा, तेरे पिता जी को लकवा मार गया। खेत बंजर पड़े हैं। गांँव में आज भी अंधेरा है।”
फोन रखते ही आरव की आंँखों के सामने चौपाल का वो लालटेन नाच गया। अगली फ्लाइट से वो गांँव पहुंँचा।
घर की हालत देखकर कलेजा फट गया। पिता चारपाई पर, माँ उनकी सेवा में। और गांँव? वही कीचड़, वही अंँधेरा।
रात भर सो नहीं पाया आरव सुबह उठकर जल्दी से उसने कंपनी को मेल लिखा –
“मैं इस्तीफा दे रहा हूंँ। मुझे अपनी मिट्टी की सेवा करनी है।”_
पिता ने सुना तो बोले – “पागल हो गया है क्या? लाखों की नौकरी छोड़ रहा है?”
आरव पिता के पैर छूकर बोला – “पिताजी, आपने खेत बेचकर मुझे इंजीनियर बनाया है। अब मेरी बारी है। इस गांँव को एक इंजीनियर की जरूरत है।”
उसने पंचायत बुलाई। बोला – “काका, हर घर से 500 रुपये महीना निर्धारित कर दीजिए। मैं सोलर कंपनी से बात करता हूंँ। छ:महीने में हर गली जगमग होगी।”
पहले लोग हँसे “शहर की हवा लग गई।”
आरव दिन-रात मेहनत करता रहा। कंपनी से लोन, और सरकार से सब्सिडी ली। छ:महीने में बिरसिंहपुर की हर गली में सोलर लाइट लग गई। चौपाल का वो पुराना लालटेन अब स्कूल के म्यूजियम में सज गया।
अगले 15 अगस्त को DM साहब आए। मंच से बोले – “ये चौपाल का दिया पूरे जिले के लिए मिसाल है। जिस बेटे ने लाखों की नौकरी ठुकराकर गांँव चुना, वही असली देशभक्त है।”
कार्यक्रम के बाद आरव माँ-पिता के पास बैठा था। माँ ने भीगे हाथों से उसका माथा चूमा। पिता ने उसका हाथ पकड़कर कहा – “बेटा, तूने दिया नहीं जलाया… तूने बुझते हुए घर को फिर से जला दिया।”
आरव ने चौपाल की तरफ देखा और धीरे से बोला – “माँ, देश सेवा के लिए वर्दी जरूरी नहीं। कभी-कभी एक छोटा दिया भी अंँधेरे को दूर कर देता है।”
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश






