वृद्ध जन -वरिष्ठ जन दिवस, 365 दिन मनाएं, बने शुभांगी माता-पिता बोझ नहीं होते, यह सब को समझाएं, वो हैं अनुरागी।
माता-पिता ने बच्चों की खुशियों के खातिर ,अपनी खुशियां सदैव है त्यागी ।
बच्चों के उज्जवल भविष्य की दुआएं ,अतीत से अभी तक है उनने मांगी ।
अनेक कष्ट उठाएं बच्चों के पालन पोषण में ,रहे सदा अनुरागी ।
देख बच्चों की मुस्कान ,माता-पिता की सारी थकान भागी।
बच्चों तुमने, बुढ़ापे में उनकी देखभाल ,सेवा, क्यों त्यागी ।
परवाह करो उनकी, सम्मान करो, सेवा करो, बनों बड़भागी।
कुछ समय उनके साथ बिताओ ,तुम भी बनो अनुरागी।
उनके अनुभव ,दुआएं पावो, गाओ गीत “माता-पिता सेवा की लगन लागी” ।
वृद्धजन की जीवन संध्या में, स्नेहदीप बनो, तुम न बनो बागी ।
वट वृक्ष की छांव है वे आज भी, प्रभु से बच्चों की खुशियां है मांगी।
कई बच्चे, बूढ़े माता-पिता को वृद्ध आश्रम भेज रहे, नफरत की गोली दागी ।
वृद्धजन बोझ नहीं है यह समझो, कर्तव्य निभाओ ,बन जाओ बड़भागी।
बच्चों पर सर्वस्व निछावर करने वाले माता-पिता के संघर्ष की, झुर्रियां गवाह है ,बनो उनके अनुरागी।
जो मंजिल मिली तुम्हें ,उसकी नींव की ईट हैं वो, वाणी बोलो उनसे मधुरस पागी ।
बुजुर्गों से व्यवहार करो सम्मान भरा, न बरसाओ अपमान की आगी।
“माता-पिता देवो भव” सनातन धर्म संस्कृति की सीमा, बच्चों तुमने क्यों है लांघी।
रचयिता
डॉक्टर शशिकला अवस्थी इंदौर मध्य प्रदेश
रचना स्वरचित और मौलिक है।






