अपनी ही छाँव में बेगानी: हिंदी दिवस का सच
सितंबर का महीना आया, फिर एक दिन का ढोंग रचेगा,
मंच सजेंगे, भाषण होंगे, हिंदी का ‘सम्मान’ बचेगा!
एक दिन की झूठी श्रद्धा में, छाती ठोंक के मुस्काते हैं,
अगले ही पल अपनी ही माँ को, हेय दृष्टि से ठुकराते हैं।
“मे आई कम इन” कहना सीखा, “प्रणाम” में अब शर्म आती है,
अपनी ही पावन भाषा अब, गँवार हमें नज़र आती है।
टूटी-फूटी अंग्रेज़ी पर, ताली बजाता यह समाज,
हिंदी बोले जो कोई तो, खिलखिला कर हँसता आज।
फ़्रेंच, स्पैनिश और जापानी, पढ़ने की कैसी होड़ लगी!
अपनी ही मीठी निज भाषा, क्यों आँखों में रोड़ बनी?
जो अपनी भाषा छोड़ चले, वे किसका मान बढ़ाएँगे?
गूंगे बन अपनी माटी का, क्या गौरव-गान गाएँगे?
भूल गए! भाषा से ही तो, संस्कृति का आधार है,
संस्कृति से ही पनपता, इस जीवन में संस्कार है।
जब भाषा का ही पतन हुआ, तो संस्कृति भी मिट जाएगी,
जड़ कट जाएगी जिस पेड़ की, क्या उसकी छाँव टिक पाएगी?
दूसरों की जूठन चुगकर, कब तक यूँ इतराओगे?
निज भाषा को मार के साहब, तुम भी मिट ही जाओगे!
अब बंद करो यह आडंबर, एक दिन का यह उत्सव-गान,
दिलाओ हर दिन हिंदी को, इस भारत में उसका स्थान।
डॉ दीपा शर्मा उजाला
फरीदाबाद






