छोटी बहन : आँगन की आख़िरी चिड़िया
अंक–31 : एक नई चिड़िया का आगमन
विवाह की रात कब बीत गई, किसी को पता ही नहीं चला।
कल तक जिस आँगन में गीत, हँसी और ठिठोली गूँज रही थी, वहाँ अब सुबह की हल्की धूप उतर रही थी।
शहनाई की आवाज़ थम चुकी थी।
मेहमानों की भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी।
लेकिन रामबेटी की आँखों में नींद नहीं थी।
वह आँगन में बैठी तुलसी के चौरे को देख रही थीं।
कितने वर्षों बाद उनके घर में ऐसा उत्सव आया था।
उन्हें अपना वह समय याद आया जब इसी आँगन में छोटी दिशिका दौड़ा करती थी।
कभी मिट्टी में खेलती, कभी माँ की साड़ी का पल्लू पकड़कर पीछे-पीछे घूमती और कभी आर्यन से रूठकर कहती, “भैया! मुझे भी अपने साथ पढ़ने ले चलो।”
रामबेटी के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
फिर उनकी आँखें नम हो गईं।
कल उनका बेटा विवाह करके अपनी जीवनसंगिनी को घर लाया था।
आज पहली बार वह इस घर की बहू बनकर इस आँगन में कदम रखने वाली थी।
रामबेटी ने मन ही मन कहा, “हे ठाकुरजी! जिस तरह मैंने अपने बच्चों को सँभाला है, उसी तरह मुझे इस बेटी को भी बेटी बनाकर रखने की शक्ति देना।”
नई सुबह
सूरज की पहली किरण आँगन में पड़ी।
दिशिका सबसे पहले उठ गई।
वह रसोई में पहुँची तो रामबेटी पहले से ही वहाँ थीं।
दिशिका ने मुस्कुराकर पूछा, “माँ, आप इतनी सुबह उठ गईं?”
रामबेटी बोलीं, “आज घर में नई बेटी आई है। माँ कैसे सो सकती है?”
दिशिका कुछ क्षण उन्हें देखती रही।
फिर धीरे से बोली, “माँ, बेटी तो पहले भी थी।”
रामबेटी मुस्कुरा दीं।
“हाँ, तू तो मेरी बेटी है ही।”
दिशिका ने माँ के कंधे पर सिर रख दिया।
कुछ क्षण दोनों चुप रहीं।
फिर दिशिका बोली, “माँ, अब भाभी भी अकेली न हो जाएँ।”
रामबेटी ने उसकी ओर देखा।
“इसीलिए तो भगवान से प्रार्थना कर रही हूँ कि तुम दोनों बहनों जैसा प्रेम बनाए रखना।”
दिशिका ने तुरंत कहा, “भाभी बहन ही तो हैं माँ।”
रामबेटी ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया।
पहली रसोई
कुछ देर बाद घर में हलचल हुई।
नई बहू उठ चुकी थी।
वह संकोच से कमरे से बाहर आई।
रामबेटी ने उसे देखा तो उनके चेहरे पर वात्सल्य उतर आया।
उन्होंने पास बुलाकर कहा, “बेटी, यहाँ किसी बात का संकोच मत करना।”
बहू ने धीरे से कहा, “जी माँ।”
रामबेटी ने फिर कहा, “मुझे माँ ही कहना।”
बहू की आँखें भर आईं।
उसने झुककर रामबेटी के चरण छू लिए।
रामबेटी ने उसे उठाकर गले से लगा लिया।
“आज से यह घर तुम्हारा भी है।”
उस एक वाक्य ने बहू के मन का सारा संकोच जैसे धो दिया।
रसोई में पहली बार नई बहू ने चूल्हे के सामने कदम रखा।
दिशिका भी उसके साथ खड़ी थी।
“भाभी, आपको जो बनाना हो बनाइए। मैं मदद करूँगी।”
बहू मुस्कुराई, “तुम मदद करोगी या मेरी परीक्षा लोगी?”
दिशिका खिलखिला पड़ी।
“मैं तो पहले दिन से आपकी सहेली बनना चाहती हूँ।”
दोनों की हँसी सुनकर रामबेटी भी मुस्कुराने लगीं।
कुछ देर बाद रसोई से हल्की-सी खुशबू पूरे घर में फैल गई।
आर्यन बाहर आया।
उसने मुस्कुराकर पूछा, “माँ, आज घर में इतनी अच्छी खुशबू कैसे?”
दिशिका ने तुरंत कहा, “भैया, अब आपको रोज पता चलेगा कि घर में खुशबू कहाँ से आती है।”
आर्यन मुस्कुराया।
नई बहू ने संकोच से उसकी ओर देखा।
रामबेटी ने दोनों को देखा और मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया।
दिशिका का छोटा-सा उपहार
दोपहर को दिशिका अपनी भाभी के कमरे में गई।
उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा था।
भाभी ने पूछा, “यह क्या है?”
दिशिका ने डिब्बा खोलकर एक छोटी-सी चाँदी की पायल निकाली।
“भाभी, यह आपके लिए।”
“लेकिन इसकी क्या जरूरत थी?”
दिशिका मुस्कुराई, “जरूरत नहीं थी। मन था।”
भाभी ने पायल हाथ में लेकर कहा, “तुमने इतना सब क्यों किया?”
दिशिका कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली, “क्योंकि मैं चाहती हूँ कि जब आप इस घर में चलें तो आपके कदमों की आवाज़ पूरे आँगन को बताए कि मेरी भाभी घर में हैं।”
भाभी की आँखें भर आईं।
उन्होंने दिशिका का हाथ पकड़ लिया।
“तुम बहुत अच्छी हो।”
दिशिका ने हँसते हुए कहा, “अच्छी तो हूँ ही, लेकिन बहुत परेशान भी करूँगी।”
दोनों हँस पड़ीं।
माँ का सपना
उस शाम रामबेटी अकेली तुलसी के चौरे के पास बैठी थीं।
आर्यन उनके पास आया।
“माँ, क्या सोच रही हो?”
रामबेटी ने बेटे की ओर देखा।
“कुछ नहीं बेटा।”
“माँ, मुझे तो लगता है तुम कुछ छिपा रही हो।”
रामबेटी मुस्कुराईं।
“आज मेरा एक सपना पूरा हुआ है।”
“कौन-सा?”
“मैंने हमेशा चाहा था कि इस घर में फिर से बच्चों की हँसी गूँजे।”
आर्यन चुप हो गया।
रामबेटी ने आगे कहा, “तेरे पिता होते तो आज बहुत खुश होते।”
यह सुनते ही आर्यन की आँखें झुक गईं।
पिता की याद उसके भीतर कहीं गहराई में आज भी जीवित थी।
रामबेटी ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा।
“बेटा, जिंदगी कभी एक जैसी नहीं रहती। कुछ लोग चले जाते हैं, कुछ नए रिश्ते आ जाते हैं। यही तो जीवन है।”
आर्यन ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“माँ, आपने बहुत सहा है।”
रामबेटी बोलीं, “नहीं बेटा… मैंने बहुत पाया भी है।”
“क्या?”
रामबेटी ने मुस्कुराकर कहा, “तुम।”
आर्यन की आँखें नम हो गईं।
आँगन की आख़िरी चिड़िया
रात को सभी सो गए।
दिशिका अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी थी।
वह उसी आँगन को देख रही थी जिसमें उसका बचपन बीता था।
कभी वह इस आँगन की सबसे चंचल चिड़िया थी।
फिर परिस्थितियों ने उसे उड़ना सिखाया।
अब उसके भाई के घर एक नई चिड़िया आ चुकी थी।
दिशिका ने मन ही मन कहा, “आँगन बदलता है, रिश्ते नहीं।”
उसने पीछे मुड़कर भाभी को देखा। फिर धीरे से मुस्कुरा दी।
उसे लगा, शायद चिड़िया के उड़ जाने का अर्थ आँगन का खाली होना नहीं होता।
कभी-कभी वह लौटकर अपने साथ एक नया बसेरा भी ले आती है।
उस रात घर में पहली बार आर्यन की पत्नी की पायल की हल्की-सी आवाज़ गूँजी।
रामबेटी ने अपने कमरे में लेटे-लेटे वह आवाज़ सुनी।
उनकी आँखें बंद थीं।
चेहरे पर मुस्कान थी।
उन्हें लगा जैसे वर्षों से सूना पड़ा आँगन फिर से बोल उठा हो।
और उस आँगन में अब केवल एक चिड़िया नहीं थी, कई रिश्तों के पंख फैल चुके थे।
*शेष भाग अगले अंक में*
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल, उत्तर प्रदेश






