राह कठिन हो, धूप प्रखर हो, फिर भी कदम बढ़ाते चल,
काँटों से मत घबरा पथिक, काँटों पर मुस्काते चल।
मंज़िल दूर भले ही हो, स्वप्नों को साकार बना,
अपने श्रम की बूंदों से तू, जीवन का आधार बना।
आँधी आए, तूफ़ाँ आए, दीप हृदय का बुझने न दे,
विपदा चाहे जितनी आए, साहस अपना झुकने न दे।
गिरना कोई हार नहीं है, गिरकर फिर उठ जाना है,
ठोकर को शिक्षक मान सदा, आगे बढ़ते जाना है।
भाग्य भरोसे बैठ न जाना, कर्मों की पतवार पकड़,
अंधियारे के बीच स्वयं तू, आशा की मशाल पकड़।
कल की चिंता छोड़ मुसाफ़िर, आज स्वयं निर्माण कर,
छोटी-सी हर कोशिश को तू, अपने जीवन का मान कर।
पर्वत भी झुक जाते हैं जब, दृढ़ संकल्प प्रबल होता है,
सूखी धरती के सीने से भी, नव-अंकुर फिर निकलता है।
तेरे भीतर शक्ति अपार है, खुद पर इतना विश्वास तो कर,
मंज़िल स्वयं कदम चूमेगी -एक बार चेष्टा तो कर।
नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)






