गोपिन नाच नचावत कान्हा, जमुना जी के तीर।
मुरली की धुन सुनि कै गोपी, खोवैं आपनि पीर।।
कदंब तले खड़े कन्हैया, अधर सम्हाले मुरली।
मधुर तान पर झूमि रही हैं, बागन केरि कली।।
चंदा हँसै निहारे लीला, मंद बहत समीर।
गोपिन नाच नचावत कान्हा, जमुना जी के तीर।।
पीताम्बर तन, मोर मुकुट सिर, मुख पर है मुस्कान।
नैनन में ऐसी छवि बसती, भूलि जाए जग-भान।।
प्रेम सुधा में डूबी गोपी, मनवा भयो अधीर।
गोपिन नाच नचावत कान्हा, जमुना जी के तीर।।
राधा संग रास रचावत कान्हा, छेड़त मधुरिम तान।
ताल मिलावत पायल छनके, बसती ब्रज की जान।।
प्रेम विवस सब खोजैं भीतर,धरे हृदय म धीर।
गोपिन नाच नचावत कान्हा, जमुना जी के तीर।।
‘शिव’ मगन हो गावत लीला, धन्य भयो ब्रज धाम।
जमुना तट पर प्रेम बरसावत, नंदलाला घनश्याम।।
मन म अइसि बसे हैं कान्हा,भूला आज शरीर।
गोपिन नाच नचावत कान्हा, जमुना जी के तीर।।
कविराज डाॅ०-शिवकुमार सिंह ‘शिव’
दुसौंती रायबरेली-२२९३०६






