तनाव के तिमिर में जब साँसें घुटने लगें,
अवसाद के थपेड़ों से स्वप्न सारे टूटने लगें।
पारिवारिक कलह और कार्य की जब मार हो,
सपनों के बदले जब महत्वाकांक्षाओं का भार हो।
पढ़ाई की होड़ में मन जब बिखर-सा जाता है,
प्रेम के आघात से जब हृदय भर-सा आता है।
अकेलेपन की तन्हाई में जब कोई राह न सूझे,
पीड़ा की उस अग्नि में जब आत्मा भीतर जूझे।
रुक जाना उस मोड़ पर, यह अंत का संदेश नहीं,
जीवन अनमोल धरोहर है, क्षणिक कोई क्लेश नहीं।
अभिभावक भी समझें मन, न थोपें अपनी अभिलाषा,
संवाद बने सहारा सबका, जगे फिर नव आशा।
संघर्षों की धूप ढलेगी, सवेरा नया आएगा,
जीवन से न मुँह मोड़ो, यह गीत अमर बन जाएगा।
नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)






