अलौकिक परमात्मा सबके
मन के भीतर!!
आत्म मंथन करता रहता
मनुष्य अपने भीतर!!
अनश्वर ईश्वर नष्ट नहीं कर सकता
स्वयं के होने का भाव!!
अंतर्द्वंद सदा ही रहता
मनुष्य मन के भीतर!!
चेतना का होता अभ्युदय तो
प्रकट रूप में दिखता भी,
मनुष्य स्वयं क्या करता
अगर नहीं होता ईश्वर!!
अमर्ष मनुष्य मन की
मानसिक प्रवृत्ति को दर्शाता है!!
पावन नहीं हो पाता ऐसे में,
नहीं होता मानव उत्कर्ष!!
अंतर्द्वंद सदा ही रहता
मनुष्य मन के भीतर..!!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान






