(विधाता छंद)
बहे नित प्रेम की गंगा सभी दिल में सुकृत्यों से।
नचे मन मोर के जैसा मनोहर भाव नृत्यों से॥
रचें रचना सदा संस्कृत सुवासित स्नेह संचारित।
सभी दिल में सदा शुभता सवेरा दिव्य टंकारित।।
सदा सच का रहे अवलंब जीवन में कृपा करना।
सभी दुख दर्द मिट जाए प्रभो कंटक सभी हरना।।
दया उपकार सेवा भावना का नित्य दर्शन हो।
मिटे दुर्भावना मन की सदा कुविचार मर्दन हो।।
सदा सत्पथ चलें अब भावना भी पुण्य पोषित हों।
सभी खुशहाल हो मानव न कोई जीव शोषित हों।
सभी उत्कर्ष ऊर्जस्वित सुहावन भव्य भूषित हों।।
सदा सुविचार उद्घोषित न कोई कर्म कलुषित हों।।
सदा सन्मार्ग पर चलकर करें उपकार जीवन में।
सदा सद्भाव संपोषित न हो दुख दर्द सीवन में।।
प्रभो वरदान दो हमको सभी सुख संपदा भर दो।
कृपा बरसे सदा मधुरिम हमारे भाव को कर दो।।
-डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
संस्थापक अध्यक्ष । संपादक । समीक्षक । स्तंभकार । छंद विशेषज्ञ ।






