बुराई से घृणा करें या घृणा को

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बुराई से घृणा करें या घृणा कोरुपांतरित करें : एक नैतिक परामर्शीय विवेचन

1.)आचार्य रजनीश अपने प्रवचन में कहते हैं कि विज्ञान इसलिये विकसित होकर सर्वजन के लिये उपलब्ध हो सका क्योंकि विज्ञान के संप्रदाय नहीं बने।धर्म के अनेक संप्रदाय बन गये, इसलिये धर्म संस्कृति नहीं बन सका। दुनिया में तीन सौ के आसपास संप्रदाय मौजूद हैं। सभी एक दूसरे के दुश्मन बनकर काम कर रहे हैं। यहां पर ध्यान देने की बात है कि विज्ञान के गिरोह नहीं होने की बात अब झूठ सिद्ध हो चुकी है।अब तो विज्ञान अनेक संप्रदायों में बंटकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गुलाम बनकर रह गया है।जिस प्रकार से विभिन्न संप्रदायों के धर्मगुरु जनमानस का शोषण कर रहे हैं ठीक उसी प्रकार से दुनिया के वैज्ञानिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों, पूंजीपतियों, उद्योपतियों और नेताओं के अनुचर बनकर जनमानस का रक्त चूसने का माध्यम रहे हैं। स्वयं आचार्य रजनीश के मिशन का बुरा हाल होते हुये हम सब देख रहे हैं। उनके देहावसान के तुरंत पश्चात् कैसे उनके ही इनर सर्कल के संबुद्ध कहे जाने वाले संन्यासियों ने ज्यूरिक और न्यूयॉर्क में आचार्य रजनीश की आध्यात्मिक संपदा पर कापीराइट करवाकर उनके अध्यात्म के चमत्कार की पोल खोल दी है।

 

2.)आज यह दुनिया जिस महंगाई, गरीबी, बदहाली, भ्रष्टाचार, भेदभाव, हिंसा और युद्धों से गुजर रही है, इसके लिये विभिन्न संप्रदाय और विज्ञान दोनों समान रूप से जिम्मेदार हैं। कहने को तो जिस तरह से विज्ञान समदर्शी है, ठीक उसी तरह से धर्म भी समदर्शी है। विज्ञान और धर्म के पीछे मौजूद लोग सभी विकृतियों के लिये जिम्मेदार हैं। संप्रदाय धर्म के नाम पर चल रहे हैं तो विज्ञान के नाम पर भी दुनिया में विभिन्न गुट बने हुये हैं। और तो और मनोविज्ञान,समाजविज्ञान,कृषिविज्ञान,युद्धविज्ञान,गृहविज्ञान,राजनीतिविज्ञान,चिकित्साविज्ञान में भी एक दूसरे के धुर विरोधी गुट बनकर काम कर रहे हैं। यदि धर्माचार्य एकमत नहीं हैं तो वैज्ञानिक भी अनेक विरोधी धड़ों में बंटे हुये हैं।धर्म ही विकृति नहीं बना है अपितु विज्ञान भी विषाक्त हो चुका है।एक वैज्ञानिक के आसपास उसके समर्थक छुटभैय्ए वैज्ञानिक,अनेक कंपनियां और सरकारें आकर खड़ी हो जाती हैं।

 

3.)हमारे चहुंओर जब अधिकांश लोग किसी भी नैतिक जीवन-मूल्य को नहीं मानते हैं,तो ऐसे विषम परिवेश में किसी एक व्यक्ति विशेष का नैतिक जीवन-मूल्यों को अपने आचरण में उतारकर जीवन-यापन करना संभव है? क्या किसी तरह से यह संभव हो सकता है? नैतिक जीवन -मूल्यों का किसी भी परिवार,समाज, संगठन, राजनीतिक दल और राष्ट्र को भलि तरह से चलाने के लिये अत्यधिक महत्व होता है। इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब सामने वाला व्यक्ति किसी भी नैतिक जीवन-मूल्य को नहीं मानता हो। हमारे तथाकथित महापुरुष कहलवाने वाले लोग जीवन के केवल एक पक्ष पर बोल रहे हैं।उनकी शिक्षाएं, उनकी सीख, उनके उपदेश और उनके प्रवचन केवल एकपक्षीय हैं। आदर्श परिवार,समाज, संगठन , संप्रदाय, राष्ट्र और राजनीतिक दल को होना तो ऐसा चाहिये कि नैतिक जीवन-मूल्यों का दोतरफा पालन आवश्यक हो। सामने वाला व्यक्ति यदि किसी भी प्रकार की नैतिकता को नहीं मानता हो तो क्या किया जाये?

 

3.)एक पक्ष नैतिक जीवन -मूल्यों को मानने वालों का है,तो दूसरा पक्ष नैतिक जीवन- मूल्यों को नहीं मानने वालों का है।जो पक्ष नैतिक जीवन -मूल्यों को मानता है,उसके लिये सिस्टम या धर्म या न्याय-व्यवस्था की ओर से सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती है। यदि वह तुरंत अपने साथ हुये दुराचरण या अत्याचार का विरोध करता है,तो उसको भी अनैतिक कहना शुरू कर दिया जायेगा। यदि वह प्रतिकार न करके अपने ऊपर हुये ज़ुल्म को सहन करके चुपचाप निकल जायेगा तो उसको डरपोक तो कहा ही जायेगा, इसके साथ- साथ उसके साथ जुल्म और अत्याचार बढ़ता ही जायेगा।उसकी मुसीबतों में बढ़ोतरी ही होती जायेगी।

 

4.)यदि वह नैतिक व्यक्ति पुलिस थाने या न्यायालय में जायेगा तो एक तरफ तो अनैतिक कहलवाने वाले गूंडे बदमाश लोग उसका जीवन दुभर कर देंगे और दूसरी तरफ पुलिस और न्यायालय में मौजूद भ्रष्टाचार के कारण उसकी कोई सुनवाई नहीं होती है। रुपये,बदमाशी, राजनीतिक पहुंच और समय उसके पास होता नहीं है।वह पुलिस थानों और न्यायालयों के चक्कर काटेगा या मेहनत, मजदूरी और नौकरी करेगा?अपना मुंह बंद रखने के लिये उसे किसी छोटे- मोटे अपराध,नशे की सामग्री,चाकू या कट्टा रखकर फंसा दिया जायेगा। आखिर वह नैतिक व्यक्ति करे तो क्या करें? किसके पास जाकर वह अपने साथ हो रहे भेदभाव, अत्याचार और ज़ुल्म की शिकायत करें?

 

5.)लोकतंत्र, राजतंत्र, तानाशाही तंत्र आदि किसी भी व्यवस्था में उसको न्याय मिलना असम्भव है।लोग कहते हुये सुने जाते हैं कि संसार में ज़ुल्म बुरे व्यक्तियों के कारण इतना नहीं बढ़ रहा है, जितना अच्छे लोगी की चुप्पी के कारण बढ़ रहा है।यह वक्तव्य बिल्कुल ग़लत है।अरे भाई, अच्छे व्यक्तियों को कहीं भी सुरक्षा की गारंटी नहीं है, जबकि बुरे व्यक्तियों के साथ नेता, धर्मगुरु, सिस्टम, पुलिस, न्यायालय, पूंजीपति आदि सभी ढाल बनकर खड़े हुये हैं।

 

6.)सभी नेता,धर्मगुरु,शिक्षक और सुधारक भोले-भाले उस जनमानस को नैतिक जीवन -मूल्यों के उपदेश और प्रवचन देते रहते हैं,जो अनैतिकता,अधर्म,अपराध और गैरकानूनी काम करने से डरते हैं। उपदेश,प्रवचन,सीख और सुधार की आवश्यकता उनको होनी चाहिये,जो अनैतिक, अधार्मिक, अपराधी और कानून का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति के होते हैं। लेकिन यह आश्चर्यजनक है कि अधिकांश ऐसे लोगों की नेताओं, धर्मगुरुओं, पूंजीपतियों, पुलिस और कानून से सांठगांठ रहती है। किसी प्रकार का अपराध आदि करने पर भी इनका कुछ नहीं बिगड़ता है। ऐसे विषमतापूर्ण परिवेश में मोरल काउंसलिंग किसकी की जानी चाहिये – भोले-भाले जनमानस की या अपराधी किस्म के लोगों की?

 

7.)साधारण निरपराधी जनमानस की हैसियत न तो अवैध कब्जे करने की है,न चोरी करने की है,न किसी की जमीन और प्लाट पर कब्जा करने की है,न किसी की हत्या करने की है, न नकली डिग्रियां खरीदने की है तथा न ही बैंकों से फ्राड करने की है। वास्तव में जिनको नैतिक परामर्श की आवश्यकता है,वो तो धनसत्ता, राजसत्ता और विधिसत्ता के सिस्टम के साथ कदम से कदम मिलाकर भोग -विलास का जीवन जी रहे हैं।

 

8.) किसी काउंसलर, सलाहकार,चिकित्सक की यह हिम्मत नहीं है कि ये उनकी मोरल काउंसलिंग कर सकें या उनको यह सब करने का परामर्श तक देने की हिम्मत कर सकें। यदि वोट लेना हो तो बहुसंख्यक मेहनतकश जनमानस, यदि टैक्स वसुली हो तो आम आदमी, यदि महंगाई की मार मारना हो तो आम आदमी, यदि सीमा पर बलिदान होना हो तो खून पसीना एक करने वाला बहुसंख्यक किसान और मजदूर। ऐसा लगता है कि जैसे काउंसलिंग, परामर्श,चिकित्सा आदि बहुत बड़ा शोषण करने का धंधा बनने की ओर अग्रसर हैं। किसी पाश्चात्य सिरफिरे लेखक या वैज्ञानिक का नाम आते ही सारी मूढताओं, अपराधों, बेवकूफियों और शोषण को सही मान लिया जाता है। विदेशी काउंसलर की अंधानुकरण की यह पराकाष्ठा न केवल चिंतनीय है अपितु चिकित्सकीय भी है। अन्यथा समकालीन सभ्यता ही संकट में पड़ जाने वाली है।

 

9.) नित्यप्रति के जीवन में ऐसी अनेक अनैतिक विषमताएं, मूल्य-विहीनताएं और संवेदनहीनताएं मौजूद हैं, जिनके बारे में नये सिरे से धारणाओं से मुक्त होकर न केवल सोचने की आवश्यकता है, अपितु कुछ न कुछ प्रायोगिक अभ्यास करने की आवश्यकता भी है।मन के जिस तल पर उपरोक्त का आवास मौजूद है,उस तल पर तथा उससे भी आगे जाकर कुछ रुपांतरणकारी करने की आवश्यकता है।केवल सूखे परामर्श या सलाह या काउंसलिंग या उपदेश देने से कोई रुपांतरण होने वाला नहीं है।

 

10.) मन आखिर अपनी चिकित्सा क्यों नहीं करवाना चाहता?ऐसी क्या दिक्कत है कि जब भी मन की चिकित्सा या हिलिंग या काउंसलिंग की बात आती है तो मन बचने के बहाने तलाश करने लगता है।मन के विरोध में कुछ भी नया करने के अवसर पर वह पलायन करने के अनेक रास्ते तलाश कर लेता है। बहाने के रूप में वह व्यक्तिगत,पारिवारिक ,आर्थिक, राजनीतिक, नैतिक, धार्मिक आदि अनेक कारण बतलाकर उनको अपनी ढाल बना लेता है। बदलाव या भविष्य तथा बदलाव नहीं करना यानी अतीत से चिपके रहना।मन आखिर अपने सुरक्षित क्षेत्र में क्यों रहना चाहता है?मन के उस सुरक्षित क्षेत्र में रहने के क्या कारण हैं तथा उस सुरक्षित क्षेत्र से बाहर आकर कुछ नया करने में मन भयभीत क्यों हो जाता है? सर्वप्रथम इस पर चर्चा, संवाद और खंडन मंडन अवश्य किया जाना चाहिये। इसके पश्चात् ही कोई प्रायोगिक अभ्यास आदि किये जा सकते हैं।

 

11.)व्यक्ति को वर्षों से जिसकी आदत हो चुकी है, जिसके साथ वह वर्षों से रहता आ रहा है तथा जो उस व्यक्ति का जाना पहचाना है, उससे उस व्यक्ति को कोई खतरा महसूस नहीं होता है। आखिर वह जाना पहचाना तो है।नये से तो व्यक्ति की कोई पहचान भी नहीं होती है।जीवन में जो जाना- पहचाना हुआ होता है,वह यदि नरक भी हो तो स्वर्ग सा लगता है। लेकिन जिससे कोई जान- पहचान नहीं होती है,वह स्वर्ग भी नरक समान लगता है। आपने देखा होगा कि इसीलिये कयी विवाहित लडकियां अपने ससुराल में सास,ससुर और पति द्वारा अनेक प्रकार से प्रताड़ित किये जाने,दुखी किये जाने तथा प्रतिदिन मारपीट किये जाते रहने के बावजूद भी वो अपने ससुराल वालों के साथ में ही रहना पसंद करती हैं। आदतों से दोस्ती होना बदलाव या नये का स्वागत करने से रोक देती हैं।मानव मन की विचित्र विशेषता है।

 

12.) गांधी जी बार बार कहते थे कि व्यक्ति से घृणा मत करो अपितु उसकी बुराईयों से घृणा करो। क्या यह वक्तव्य सही है? घृणा चाहे व्यक्ति से हो या फिर बुराईयों से हो- दोनों ही गलत हैं। आखिर घृणा क्यों की जाये? यदि घृणा व्यक्ति के भीतर प्रबल रहेगी तो व्यक्ति को परेशान करती रहेगी।वह यह रहकर व्यवहार में बाहर आती रहेगी। गांधी का यह वक्तव्य पाश्चात्य संदर्भ में नैतिक तो हो सकता है लेकिन धार्मिक या आध्यात्मिक या आमूल रुपांतरणकारी नहीं कहा जा सकता है। गांधी के इस वक्तव्य से यह भी आभास हो जाता है कि गांधी जी पाश्चात्य जीवन-शैली के अनुसार नैतिक तो थे लेकिन भारतीय जीवन शैली के अनुसार धार्मिक नहीं थे। वैसे भी गांधी को सनातन धर्म और संस्कृति के संबंध में जानकारी पाश्चात्य विचारकों ब्लावट्स्की,थोरो,रुसो और टालस्टाय आदि के माध्यम से हुई थी। सीधे सीधे उन्होंने न तो सनातन धर्म और संस्कृति को जानने का कभी प्रयास किया तथा न ही उनकी पुस्तकों और उनके दैनिक वक्तव्यों से ऐसा आभास होता है।

 

13.)गांधी जी की गीता व्याख्या ‘गीता माता’,’सत्य के प्रयोग’ आदि पर पाश्चात्य विचारकों का पूरा प्रभाव है। इसके ठीक विपरीत उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती और स्वामी श्रद्धानंद आदि के प्रति जो असहमति दिखलाई है,वह भी उनकी पाश्चात्य नैतिक विचारधारा से प्रभावित होने की ओर संकेत करती है।वेद, उपनिषद्, दर्शनशास्त्र, स्मृति,पुराण आदि सनातन ग्रंथों का उन्होंने सनातनी जीवन शैली के अनुसार अध्ययन -अध्यापन नहीं किया था। इससे कोई यह नहीं समझे कि मेरे मन में गांधी जी द्वारा भारतहित में किये गये कार्यों के प्रति धन्यवाद का भाव नहीं है। लेकिन किसी व्यक्ति की शिक्षाओं के दूरगामी प्रभाव को जांचा -परखा जाना भी आवश्यक है।

 

14.)इसके बजाय आचार्य रजनीश की यह सीख अधिक सांसारिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से अधिक तर्कसंगत और सही है कि व्यक्ति की कमियों से घृणा करने के बजाय उनका रुपांतरण करो। घृणा और प्रेम के पीछे एक ही प्राणशक्ति कार्यरत है।बस, उसकी दिशा को बदलना आवश्यक है। घृणा करने से तो मामला और भी अधिक बिगड़ जायेगा। घृणा करने से बदलाव नहीं हो सकता। बदलाव रुपांतरण से ही संभव है। और रुपांतरण के लिये केवल नैतिक शिक्षाएं और प्रवचन काफी नहीं हैं। इसके लिये कुछ गहन और आंतरिक अभ्यास करने होंगे। लाखों वर्षों से इन आंतरिक अभ्यासों को ही योगाभ्यास कहा गया है।

………….

डॉ. शीलक राम आचार्य

दर्शनशास्त्र -विभाग

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय

कुरुक्षेत्र -136119

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