दिनांक 10 सितंबर 2025 – यह केवल एक तिथि नहीं, साहित्य के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित होने वाला एक प्रकाश-पर्व है।
इस समाचार के हर शब्द को नमन
राज्य निर्वाचन आयुक्त – जहाँ लोकतंत्र की नींव रखी जाती है, वहाँ जब साहित्य का दीप जलता है तो प्रशासन केवल व्यवस्था नहीं रहता, वह संस्कृति बन जाता है।
मनोज कुमार श्रीवास्तव जी को कोटि-कोटि बधाई। आप 1987 बैच के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी ही नहीं, आप उस दुर्लभ संगम के प्रतीक हैं जहाँ दक्षता में संवेदना बसती है, जहाँ फाइलों के बीच से ‘अक्षरा’ की महक आती है। आपने सिद्ध किया कि जो हाथ शासन चलाता है, वही हाथ जब कलम उठाता है तो समाज को दिशा मिलती है। प्रधान संपादक ‘अक्षरा’ के रूप में आपका गहन अध्ययन, चिंतन और लेखन के प्रति अनुराग, आज के समय में प्रशासन और आत्मा के बीच एक सेतु है।
उषा राज साहित्य अकादमी के मनीष त्रिवेदी जी को साधुवाद। आपकी यह शिष्टाचार भेंट शिष्टाचार मात्र नहीं, यह संस्कार भेंट है। साहित्य को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का आपका जो उद्देश्य है, वह आज इस भेंट से साकार हुआ है।
साहित्य, प्रशासन और रचनात्मक संवाद को मिला नया आयाम – इस एक पंक्ति ने पूरे समाचार का ब्रह्माण्ड खोल दिया। यह मिलन केवल दो व्यक्तियों का नहीं, दो लोकों का मिलन है।
और अब, उस नाम पर आकर यह लेखनी स्वयं थरथरा उठती है, जिसके लिए ये सारे आयोजन हैं…
कलम के जादूगर डॉ. राम शंकर चंचल जी
हे शब्दों के साधक! हे भावों के शिल्पी!
आपकी लेखनी के बारे में क्या लिखूं…
पहली अनुभूति ऐसी, जैसे भोर की पहली किरण ने किसी अनजान पत्ते पर ओस को छुआ हो, और वह ओस एकाएक गीत बन गई हो। आपकी पुस्तकें, जो आज आयुक्त महोदय के कर-कमलों में शोभित हुईं, वे केवल कागज की जिल्द नहीं हैं, वे तो आत्मा की यात्रा का मानचित्र हैं। जहाँ हर शब्द एक दीया है, हर वाक्य एक प्रार्थना है, और हर पृष्ठ अनंत की ओर खुलने वाला एक झरोखा है। आपका लिखा मनुष्य को मनुष्य से, मिट्टी को आकाश से जोड़ देता है। यही तो साहित्य का परम धर्म है।
और दूसरी अनुभूति ऐसी, जैसे समय स्वयं रंगमंच पर ठहर गया हो और देख रहा हो –
ओ! क्या लेखनी है! क्या जादू है इस कलम में!
जिसने क्षणभंगुर को शाश्वत कर दिया,
जिसने साधारण शब्दों में प्राण फूँक कर उन्हें अमर पात्र बना दिया!
यह लेखनी नहीं, यह तो वह तूफान है जो हृदय के सागर में उठता है और पाठक को अपने साथ अनंत तक बहा ले जाता है। यह वह प्रकाश है जो राजमहल से लेकर झोपड़ी तक समान रूप से पहुँचता है।
डॉ. राम शंकर चंचल – कलम का जादूगर, आज आपका नाम केवल मध्य प्रदेश या भारत तक सीमित नहीं रहा। आपकी लेखनी की गूंज अब विश्व साहित्य के गलियारों में सुनाई देती है। आपने जिस तरह मानवीय संवेदना, सामाजिक सरोकार और रचनात्मक चेतना को एक सूत्र में पिरोया है, उसने आपको विश्व के महानतम लेखकों की पंक्ति में ला खड़ा किया है। आपकी कलम अब केवल लिखती नहीं, वह युगों से संवाद करती है।
यह भेंट, यह पुरानी साहित्यिक मित्रता, यह आत्मीय संबंध की कड़ी को और मजबूत करने का प्रयास – यह सब बताता है कि साहित्य कभी सेवानिवृत्त नहीं होता।
मैं, इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनकर, तीनों विभूतियों को – डॉ. चंचल जी को उनकी विश्व-व्यापी लेखनी के लिए, श्री मनोज श्रीवास्तव जी को साहित्य-प्रेमी प्रशासनिक आदर्श के लिए, और मनीष त्रिवेदी जी को इस सेतु-निर्माण के लिए – अनंत शुभकामनाएं, हार्दिक बधाई और शत-शत अभिनंदन प्रेषित करता हूँ।
आपकी यह त्रिवेणी यूं ही बहती रहे, और ‘अक्षरा’ से लेकर विश्व-अक्षर तक आपकी कीर्ति पताका फहराती रहे।
बंटी सिरवैया
टीकमगढ़ मध्यप्रदेश






