कभी, कभी मन के दरवाजे,
पर, आकर,रुक जाते हैं शब्द।
मचलते हैं बाहर आने को,
मगर सहम जाते हैं शब्द।
कभी, कभी मन के दरवाजे, पर, आकर,मचलते है शब्द।
और मन के बाहर आकर,
गीत, गज़ल,कविता बन जाते है शब्द।
कुछ कहते हैं दर्द की बातें,
कुछ कहते हैं अरमान।
कुछ आँखों में छुपे हुए हैं,
कुछ बन जाते हैं मुस्कान।
कभी ख़ामोशी ओढ़ लेते,
कभी बन जाते हैं मीत।
कभी मन में दुबके रहते है,
कभी बन जाते है सारे गीत।
और जब,कागज़ पर उतरते हैं,
तो बन जाते हैं एहसास।
शब्द नहीं रहते केवल शब्द,
बन जाते हैं शब्द सबसे खास।
कभी,कभी,मन के दरवाजे
पर आकर,रुक जाते हैं शब्द।
मचलते हैं बाहर आने को,
मगर,सहम जाते हैं शब्द।
बंदना मिश्रा
देवरिया, उत्तर प्रदेश






