वाराणसी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के अवसर पर राजकीय पुस्तकालय सभागार, अर्दली बाजार, वाराणसी में विश्व जनचेतना ट्रस्ट भारत एवं साहित्य पथ, किश्वाड़ा के संयुक्त तत्वावधान में दार्शनिक एवं साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अंतरराष्ट्रीय वक्ता, दार्शनिक एवं साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने कहा कि जैन दर्शन का स्याद्वाद – अनेकांतवाद भारतीय चिंतन की उस उदार एवं संवादशील परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जो सत्य को एकांगी दृष्टि से देखने के बजाय उसके बहुआयामी स्वरूप को स्वीकार करती है। गांधी के सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता, आत्मसंयम और प्रतिपक्ष के विचारों के प्रति सम्मान को समझने में जैन दर्शन की यह दृष्टि महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि गांधी के लिए सत्य केवल बौद्धिक अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन-साधना था और सत्याग्रह उसी साधना का नैतिक एवं सामाजिक रूप था। अनेकांतवाद और गांधी का सत्याग्रह दोनों ही संवाद, आत्मपरीक्षण तथा अहिंसक सह-अस्तित्व की भावना को पुष्ट करते हैं। उन्होंने कहा कि लाल बहादुर शास्त्री भी भारतीय जीवन-मूल्यों, सादगी, कर्तव्यनिष्ठा और नैतिक सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। गांधी और शास्त्री दोनों का जीवन भारतीय समाज के सामने यह संदेश रखता है कि सार्वजनिक जीवन की सार्थकता केवल सत्ता या पद में नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठा, त्याग, अनुशासन और लोकमंगल की भावना में निहित है। आज के समय में गांधी, शास्त्री और भारतीय दार्शनिक परंपराओं का पुनर्पाठ समाज में संवाद, संयम और नैतिक चेतना को मजबूत करने की दिशा में उपयोगी हो सकता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के पूर्व कुलपति प्रो. आचार्य धर्मेंद्र ने डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की कृतियों संक्रांति का संहार और काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि संक्रांति का संहार पानीपत के तृतीय युद्ध को केवल एक ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसके भीतर निहित राष्ट्रीय चेतना, संघर्ष, नेतृत्व, रणनीति और ऐतिहासिक चेतावनियों को सामने लाती है। वहीं काल यात्रा : वेद से बर्लिन तक भारतीय ज्ञान-परंपरा से आधुनिक विश्व तक की दीर्घ वैचारिक एवं सांस्कृतिक यात्रा को समझने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि दोनों कृतियों में इतिहास और चिंतन का समन्वय दिखाई देता है तथा लेखक अतीत को केवल स्मरण करने के बजाय उससे वर्तमान के लिए दृष्टि और प्रश्न प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

तृतीय सत्र में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें डॉ. शरद कुमार श्रीवास्तव शरद, श्री संतोष कुमार प्रीत, श्री आनंद कृष्ण मासूम, श्री रामजतन सज्जन, डॉ. विनोद कुमार वर्मा, श्री सूर्य दीप, श्री धानपुरी, श्री महेंद्र जी, श्री विकास पाण्डेय एवं अन्य कवियों ने अपनी रचनाओं का काव्य पाठ प्रस्तुत किया। कवियों की विविध रचनाओं ने कार्यक्रम को साहित्यिक गरिमा प्रदान की और श्रोताओं ने काव्य प्रस्तुतियों का आनंद लिया।
कार्यक्रम में पूर्व प्राचार्य डॉ. अशोक कुमार सिंह, पूर्व संकाय प्रमुख महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी प्रो. महेंद्र मोहन वर्मा, पुस्तकालयाध्यक्ष कंचन सिंह परिहार, सदस्य शिक्षा सेवा चयन आयोग, प्रयागराज डॉ. हरेंद्र राय सहित अनेक विद्वान, साहित्यकार, शिक्षाविद्, विद्यार्थी एवं प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन यूपी कॉलेज, वाराणसी के पूर्व प्रवक्ता डॉ. विनोद कुमार वर्मा ने किया।






