सुख की छाँव जब-जब पाई,
आँखों ने फिर मोती ढाले।
सुख के आँसू भी नमकीन हैं,
दुख के आँसू भी मतवाले।
जीवन की इस लंबी यात्रा में,
सब कुछ पाकर भी खोया है,
मीठे जल की प्यास बुझाकर,
हर प्राणी भीतर रोया है।
समंदर की गहराई में,
लहरों का कोलाहल भारी।
नैनों की इस गहराई में,
दर्द की दुनिया न्यारी-न्यारी।
बाहर सब कुछ मीठा-मीठा,
भीतर खारा असीम किनारा,
किसने इस जीवन के सागर,
में ऐसा जादू है डारा?
नीरज तँवर






