भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक दासता से मुक्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह भारत की आत्मा, उसकी संस्कृति, उसके आत्मसम्मान और उसके जीवन-मूल्यों की पुनर्स्थापना का आंदोलन भी था। यही कारण था कि स्वतंत्रता संग्राम के लगभग सभी प्रमुख नेताओं ने भाषा और संस्कृति को राष्ट्रनिर्माण के मूलाधार के रूप में देखा। महात्मा गांधी ने स्पष्ट कहा था कि यदि हमें स्वराज्य चाहिए तो हमें अपनी शिक्षा अपनी भाषा में प्राप्त करनी होगी। उनके लिए विदेशी भाषा में शिक्षा लेना आत्मा का गला घोंटने जैसा था। गांधीजी ने ‘हिंद स्वराज’ में अंग्रेजी शिक्षा और विदेशी मानसिकता के प्रभाव पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। इसी दृष्टि से देखा जाए तो 1947 में हमें राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली, किंतु मानसिक स्वतंत्रता का लक्ष्य आज भी पूरी तरह प्राप्त नहीं हुआ है।
राष्ट्र की भाषा का प्रश्न केवल संवाद का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मगौरव का प्रश्न है। जब कोई राष्ट्र अपनी भाषा को तिरस्कृत कर विदेशी भाषा को प्रतिष्ठा और सफलता का प्रतीक मानने लगे तो यह स्थिति उसकी मानसिक गुलामी की ओर संकेत करती है। भारत में लंबे समय तक ऐसी मानसिकता दिखाई देती रही है। हमारे विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी को अक्सर श्रेष्ठ और हिंदी तथा भारतीय भाषाओं को अपेक्षाकृत कम महत्त्व देने की प्रवृत्ति रही है। नौकरी, प्रशासन, उच्च शिक्षा और न्याय जैसे क्षेत्रों में अंग्रेजी का प्रभाव आज भी व्यापक है। प्रश्न यह है कि जिस देश के करोड़ों नागरिक अपनी मातृभाषा में सोचते और जीवन जीते हैं, उसके ज्ञान और शासन की व्यवस्था उनकी भाषाओं से इतनी दूर क्यों हो?
भारत का संविधान भी भाषा के प्रश्न को अत्यंत गंभीरता से देखता है। संविधान सभा में राजभाषा को लेकर लंबी और गहन बहस हुई। अंततः हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया और अंग्रेजी के प्रयोग को भी जारी रखने की व्यवस्था की गई। स्वतंत्रता के इतने दशकों बाद भी अंग्रेजी का प्रभाव कम होने के बजाय अनेक क्षेत्रों में और अधिक मजबूत हुआ है। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हमने भाषा के क्षेत्र में वास्तविक आत्मनिर्भरता की दिशा में पर्याप्त प्रयास किए हैं?
आत्मनिर्भर भारत का अर्थ केवल देश में वस्तुओं का उत्पादन करना या विदेशी वस्तुओं का विकल्प तैयार करना नहीं है। वास्तविक आत्मनिर्भरता तब होगी, जब भारत ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, चिकित्सा, प्रशासन और चिंतन के क्षेत्र में भी अपनी भाषाओं में सक्षम होगा। जिस राष्ट्र का ज्ञान उसकी जनता की भाषा में उपलब्ध नहीं है, उसकी आत्मनिर्भरता अधूरी मानी जाएगी। भाषा ज्ञान तक पहुँच का सबसे प्रभावी माध्यम है। यदि विद्यार्थी किसी विषय को अपनी भाषा में सहजता से समझ सकता है तो उसकी रचनात्मकता, प्रश्न करने की क्षमता और अनुसंधान की प्रवृत्ति अधिक विकसित हो सकती है।
विश्व के अनेक देशों ने अपनी भाषाओं को आधुनिक ज्ञान और विकास का माध्यम बनाकर उल्लेखनीय प्रगति की है। जापान ने आधुनिक विज्ञान और तकनीक को अपनाया, लेकिन अपनी भाषा को पीछे नहीं छोड़ा। चीन ने अपनी भाषा में शिक्षा, अनुसंधान और तकनीकी ज्ञान को व्यापक आधार दिया। इजरायल ने हिब्रू भाषा के पुनरुत्थान के माध्यम से भाषा को राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आधार बनाया। इन देशों ने विदेशी ज्ञान को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे अपनी भाषाओं में आत्मसात किया। भारत के लिए भी यही रास्ता अधिक उपयोगी हो सकता है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता है। हिंदी को लेकर चर्चा करते समय यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि भारत की सभी भारतीय भाषाएँ हमारी राष्ट्रीय विरासत का हिस्सा हैं। हिंदी का विकास अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि उनके साथ सहयोग और संवाद के माध्यम से होना चाहिए। हिंदी देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संपर्क की महत्वपूर्ण भाषा है और करोड़ों लोग इसे बोलते, समझते या विभिन्न स्तरों पर इसका प्रयोग करते हैं। इसलिए हिंदी को मजबूत करने का अर्थ अन्य भारतीय भाषाओं को कमजोर करना नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं के सामूहिक विकास का वातावरण तैयार करना होना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान, चिकित्सा, कानून, प्रबंधन, अर्थशास्त्र और तकनीक का उच्च स्तरीय ज्ञान भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए। केवल शब्दों का अनुवाद पर्याप्त नहीं होगा। हमें ऐसी वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली विकसित करनी होगी जो सरल, सहज और व्यावहारिक हो। विश्वविद्यालयों में भारतीय भाषाओं में उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम और शोध की सुविधाएँ बढ़ानी होंगी। यदि कोई विद्यार्थी अपनी भाषा में भौतिकी, रसायन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग या कानून पढ़ना चाहता है तो उसके सामने भाषा बाधा नहीं बननी चाहिए।
चिकित्सा के क्षेत्र में भी भाषा का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। डॉक्टर और मरीज के बीच प्रभावी संवाद उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि मरीज बीमारी, जांच, दवा और उपचार संबंधी निर्देश अपनी भाषा में ठीक से समझ सके तो चिकित्सा व्यवस्था अधिक मानवीय और प्रभावी बन सकती है। इसी प्रकार कानून और न्याय की भाषा भी आम नागरिक के लिए समझने योग्य होनी चाहिए। नागरिक को अपने अधिकारों, कर्तव्यों और न्यायिक प्रक्रिया को समझने के लिए किसी विदेशी भाषा पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
डिजिटल युग ने भारतीय भाषाओं के सामने नई संभावनाएँ भी पैदा की हैं। आज मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से भारतीय भाषाओं में ज्ञान का विस्तार पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से किया जा सकता है। हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण डिजिटल सामग्री तैयार करने की आवश्यकता है। यदि हम अपनी भाषाओं में विश्वस्तरीय ज्ञान-सामग्री तैयार कर सकें तो भाषा केवल संस्कृति की पहचान नहीं रहेगी, बल्कि आर्थिक और तकनीकी विकास का साधन भी बनेगी।
यहाँ नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सरकार से अपेक्षा करना आवश्यक है, लेकिन केवल सरकार के भरोसे भाषा का उत्थान नहीं हो सकता। समाज को अपनी भाषाओं के प्रति सम्मान की भावना विकसित करनी होगी। अभिभावकों को यह समझना होगा कि अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करना पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं है। शिक्षकों को भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन-सामग्री तैयार करनी होगी। लेखक, पत्रकार, वैज्ञानिक और शोधकर्ता अपनी भाषाओं में गंभीर साहित्य और ज्ञान का निर्माण करें, तभी भाषाई आत्मनिर्भरता का आधार मजबूत होगा।
हमें यह मानसिकता बदलनी होगी कि अंग्रेजी जानना ही बुद्धिमत्ता और सफलता का प्रमाण है। अंग्रेजी सहित किसी भी विदेशी भाषा का ज्ञान निश्चित रूप से उपयोगी है और विश्व से संवाद के लिए आवश्यक भी हो सकता है, लेकिन विदेशी भाषा का ज्ञान अपनी भाषा के प्रति हीन भावना का कारण नहीं बनना चाहिए। दुनिया की अनेक भाषाएँ सीखना ज्ञान का विस्तार है, लेकिन अपनी भाषा को भूल जाना आत्मविस्मृति है।
भारत की वास्तविक शक्ति उसके पास उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से कहीं अधिक उसके ज्ञान, प्रतिभा, संस्कृति और मानवीय संसाधनों में है। यदि इस प्रतिभा को उसकी अपनी भाषाओं में अवसर मिले तो देश की विकास-यात्रा और अधिक व्यापक हो सकती है। भाषा के माध्यम से ज्ञान आम जनता तक पहुँचेगा, शोध का दायरा बढ़ेगा और शिक्षा अधिक समावेशी बनेगी।
इसलिए आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की यात्रा में ‘अपनी भाषा, अपना ज्ञान’ केवल एक भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आवश्यकता है। हमें ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें भारतीय भाषाएँ घर और समाज की भाषा होने के साथ-साथ शिक्षा, शोध, प्रशासन, विज्ञान, तकनीक और न्याय की प्रभावी भाषा भी बन सकें।
वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब नागरिक अपने अधिकारों को समझ सके, अपने ज्ञान का निर्माण कर सके और अपनी भाषा में आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने अपने विचार रख सके। अपनी भाषा को सम्मान देना अतीत में लौटना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से शक्ति लेकर भविष्य की ओर बढ़ना है।
अतः भारत को यदि वास्तव में आत्मनिर्भर और ज्ञान-समृद्ध राष्ट्र बनना है तो उसे अपनी भाषाओं को राष्ट्रनिर्माण के केंद्र में रखना होगा। अपनी भाषा, अपना ज्ञान और आत्मनिर्भर भारत—ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब भारत अपनी भाषाओं में ज्ञान का सृजन करेगा, अपनी प्रतिभा को अपनी भाषाओं में अवसर देगा और विश्व का ज्ञान अपनी भाषाओं में आत्मसात करेगा, तभी आत्मनिर्भर भारत का सपना पूर्ण अर्थों में साकार होगा।
डॉ. सुरेश जांगडा
राजकीय महाविद्यालय सांपला
रोहतक (हरियाणा)






