हे माँ, गीर्वाणभारती की आत्मजा।
स्वीकारे हैं तुम्हें सारे भारत की प्रजा।
द्वाविंशति भाषाओं की हो तुम भगिनी।
भाषाई सौहार्दता की नित पुष्करणी।
स्वतंत्रता संग्राम में भी रही तुम अहं।
स्वतंत्रता सेनानियों की जोड़ी तुम स्वयं।
हो तुम स्वतंत्र भारत की निज गौरव वाणी।
हे भारत प्रजातंत्र की संविधान मुख वाणी।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक संपर्क हेतु।
भारतीय जनमानस की हो तुम भाव सेतु।
हो तुम माँ भारती की भाषा मुकुट मणि।
राजभाषा पीठ पर अभिषिक्त महारानी।
विदेश में भी जागी है तुम से भारतीयता।
तेरे माध्यम से ही बढ़ी है आत्मीयता।
करें कोई तेरे साथ कितना भी विरोध।
विकसित हुई हो तुम सहकर सारे अवरोध।
मात्र एक दिन हिन्दी दिवस पर ही नहीं।
मेरी भावाभिव्यक्ति का माध्यम तू ही सही।
निश-दिन करुँगी सदा तेरी आराधना।
अर्पित है हे हिन्दी, तुम्हें अनुराधा के भाव संवेदना।
*****
©® डॉ. अनुराधा के, मंगलूरु, कर्नाटक






