बस आज नहीं , सब दिन हमारा हिन्दी-दिवस,
यही हमारी मातृभाषा, फिर हम क्यों हों विवश।
वैज्ञानिकता से परिपूरित,देववाणी की तनया,
मिठास से भरी हुई,सरल,सुगम समाहित करती कन्या।
गौरवान्वित होते हम इसमें करते चिंतन,
स्व भावों से अवगत कराते,सबको ही अकिंचन।
मनोमस्तिष्क में छाई रहती नहीं तनिक भी शंका होती।
सम्पूर्ण अधिकार से हम कहें, माँ भारती का शृंगार है हिन्दी।।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत मनोभाव, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।






