पहली बारिश में डूब गया कानपुर, “स्मार्ट सिटी” निकली कागज़ी जुमला सिटी नाले बने मौत के मुहाने, सीवर घुसा घरों में, अफसर एसी कमरों में और जनता गंदे पानी में बेहाल

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दि ग्राम टुडे,कानपुर।
मानसून की पहली ही बारिश ने कानपुर नगर निगम, स्मार्ट सिटी परियोजना और जनप्रतिनिधियों के तमाम विकास दावों को बहाकर सीधे नालों में पहुंचा दिया। जिस कानपुर को “स्मार्ट सिटी” बनाने के सपने दिखाए गए थे, वह पहली बारिश में ही “जलमग्न सिटी” बनकर सामने आ गया। शहर की सड़कें तालाब में बदल गईं, गलियां नालों में तब्दील हो गईं और लोगों के घरों में सीवर का जहरीला पानी घुस गया।
बारिश थम गई, लेकिन नगर निगम की लापरवाही की बदबू अब भी पूरे शहर में तैर रही है। जगह-जगह जलभराव ने यह साबित कर दिया कि करोड़ों रुपये की योजनाएं सिर्फ पोस्टरों, विज्ञापनों और उद्घाटन मंचों तक सीमित थीं। जमीनी हकीकत में शहर आज भी बदहाल, बेहाल और भगवान भरोसे है।

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“स्मार्ट सिटी” का स्मार्ट ड्रामा
पहली बारिश में फेल
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कानपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए, लेकिन विडंबना देखिए कि पहली ही बारिश में पूरा शहर पानी में बहता नजर आया। जिन सड़कों को चमचमाता विकास बताया गया था, वहां लोग नाव चलाने की बात करने लगे। नाले उफन पड़े, नालियों ने दम तोड़ दिया और जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई।
ऐसा लग रहा था मानो नगर निगम ने बारिश से पहले नालों की सफाई नहीं, बल्कि सिर्फ फोटोशूट की सफाई कराई हो। अफसरों की फाइलों में नाले साफ थे, लेकिन जमीन पर कूड़ा, गंदगी और सीवर का सैलाब बह रहा था।
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घरों में घुसा सीवर, लोगों की जिंदगी बनी नरक
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शहर के कई इलाकों में सीवर का गंदा पानी लोगों के घरों में घुस गया। बिस्तर, राशन, फर्नीचर और घरेलू सामान पानी में डूब गया। बदबू और गंदगी के बीच लोग अपने ही घरों में कैद होने को मजबूर हो गए।
बुजुर्गों और बच्चों का सबसे बुरा हाल रहा। लोगों का कहना है कि हर साल यही तस्वीर देखने को मिलती है — नेता चुनाव के समय विकास का सपना दिखाते हैं और बारिश आते ही पूरा सपना नाले में बह जाता है।
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जनता पूछ रही — आखिर गया कहां विकास का पैसा?
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जनता अब खुलकर सवाल पूछ रही है कि आखिर हर साल नाला सफाई, जल निकासी और स्मार्ट सिटी के नाम पर खर्च होने वाला करोड़ों का बजट जाता कहां है? अगर पहली बारिश में ही शहर डूब जाए तो फिर इन योजनाओं का फायदा किसे मिल रहा है?
लोगों का कहना है कि नगर निगम के अधिकारी हर साल मानसून से पहले “तैयारी पूरी” होने का दावा करते हैं, लेकिन बारिश की पहली बूंद ही इन दावों की असलियत उजागर कर देती है। ऐसा लगता है कि अफसरों की तैयारी सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस और कागजी रिपोर्ट तक सीमित है।
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जनप्रतिनिधियों के वादे भी पानी में बहे
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जनप्रतिनिधि विकास के नाम पर बड़े-बड़े भाषण देते रहे, लेकिन जनता आज भी जलभराव की त्रासदी झेल रही है। सड़कें टूटी हुई हैं, नाले जाम हैं और सीवर व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। जनता अब तंज कसते हुए कह रही है कि “स्मार्ट सिटी” में अगर यही हाल है, तो आम शहरों की हालत का अंदाजा खुद लगाया जा सकता है।
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हर साल वही कहानी, हर बार वही बहाना
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कानपुर वासी वर्षों से जलभराव का दंश झेल रहे हैं। हर मानसून से पहले नालों की सफाई के दावे किए जाते हैं, निरीक्षण होते हैं, फोटो खिंचती हैं, लेकिन बारिश आते ही पूरा सिस्टम घुटनों के बल नजर आता है। अफसर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते हैं और जनता गंदे पानी में अपनी जिंदगी ढोने को मजबूर रहती है।

पहली ही बारिश ने कानपुर नगर निगम की तैयारियों, स्मार्ट सिटी मिशन और जनप्रतिनिधियों के विकास मॉडल की पूरी पोल खोल दी है। सवाल सिर्फ जलभराव का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो हर साल करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद जनता को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दे पा रही।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार लोग सिर्फ बयान, निरीक्षण और फोटोबाजी तक सीमित रहते हैं या सच में कानपुर को जलभराव और सीवर संकट से राहत दिलाने के लिए कोई ठोस कदम उठाते हैं।

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