आग लगाने वाले भड़काऊ,वचन तो कभी नहीं बोलें।
मुँह खोलने से पूर्व सौ बार सोचें,शब्द-भाषा ये तोलें।।
मानव के कोमल मन में,कटु बोल के जहर नहीं घोलें।
भड़काऊ बातें भाषा शब्दों से,अपना मुँह मत खोलें।।
इससे घर परिवार समाज में,रिश्तों में कड़वाहट आए।
अंतर्मन सदैव व्यथित होते ही,अपनापन न रह जाए।।
भड़काऊ बोल के भी प्राणी,होते जिनसे रहा न जाए।
उनके बोल से समाज प्रांत,राष्ट्र में नफरत बढ़ जाए।।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः।।
हमेशा सच बोलो पर ऐसा,जो सुनने में भी मधुर लगे।
ऐसा कटु सच मत बोलें जो,सुन इंसाँ को दुखद लगे।।
किसी के हर्ष हेतु प्रिय लगने,वाला झूठ भी मत बोलें।
यही तो शाश्वत-महान मानवीय,धर्म ऐसे सदैव बोलें।।
शिक्षा के बिना मनुष्य पशु के समान,होता हो गया है।
भर्तृहरि ‘नीतिशतकम्’ के श्लोक,से ये लिया गया है।।
राजनीत की बात अलग है,भड़काऊ बोल रह गया है।
सामाजिक समरसता का,आज ढ़ांचा ही ढह गया है।।
निज काम के उकसाऊ-भड़काऊ,बोली बोलें हैं लोग।
शांति भंग-अशांति का फल,भुगतें जन मानस लोग।।
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रचयिता :
*ज्ञान विभूषण डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.






