प्रजा तंत्र है, चुनाव होते,
वोट माँगते हाथ जोड़ कर,
नमस्कार जनता को कहते,
नेताजी तब घर घर जाकर।
उन्हें लुभाना आता है,जनता
को अपना कहना भी आता है,
सबसे नाता जोड़ जोड़ कर,
उनको वोट माँगना आता है।
जाति धर्म के नाम बाँट कर,
सबको फुसलाना आता है,
कोरे वादों की उम्मीद दिखा
कर हमको बहलाना आता है।
झूठे दावों का झाँसा देकर,
ये सब नेता चुनाव लड़ते हैं,
आज़ादी के सतहत्तर सालों से
ये जनता को आये ठगते हैं।
ये इक थाली के चट्टे बट्टे हैं,
इन सबके ज़मीर हैं मरे हुये,
अपराध प्रकृति से ग्रसित,
सामाजिक द्रोह से भरे हुये।
दल बदलू जाति इनकी होती है,
आज इस दल में कल उस दल में,
मौक़ा पाकर सत्ता की ख़ातिर नेता
नगरी घुस जाते किसी और दल में।
नेता चाहे जिस दल में जायें,
दरवाज़े हर दल के हैं खुले हुये,
सत्ता कैसे भी हो इनकी, देश
रसातल जाये या दलदल में।
दाम धड़ाधड़ बढ़ रहे, डीज़ल,
पेट्रोल गैस, तेल सब होते महँगे,
दवा, अनाज, तिलहन, दलहन,
डाक्टर वैद्य भी कहाँ हैं सस्ते।
चुनाव जीत कर बदले भाषा
ये खुद माननीय बन जाते हैं,
मर्यादित भाषा छोड़ सड़क पर,
गाली गलौज छिड़ जाते हैं।
आरोपों प्रत्यारोपों के फिर
दौर निरंतर चलते रहते हैं,
जनता जूझती समस्याओं से,
नेता मंत्री शोषण करते हैं।
न्यायालय नाम के न्याय मंदिर,
बस चिर इंतज़ार के यह घर हैं,
तारीख़ पर तारीख़ मिले, लाखों
लाख मामले जहाँ लम्बित हैं।
नेता अधिकारी सब मिलकर,
लूट रहे अब सारे भारत को,
भ्रष्टाचार का बोलबाला है
ग्रहण लगा है अर्थ तन्त्र को।
न्यायपालिका, कार्यपालिका,
विधायिका, बिका मीडिया भी,
भारत के चारों स्तम्भ भ्रष्ट, बुरा
लगे तो माँग रहा हूँ मैं माफ़ी भी।
कैसा यह भारत होगा मेरा,
आत्म निर्भरता कैसे आएगी,
’आदित्य’ स्थिति भारत की कैसे
देश को विश्वगुरू बना पाएगी?
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र, ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ ‘विद्यासागर’, लखनऊ






