वरिष्ठ जन पर कविता 

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झुकती है कमर एक दिन

बाल होते भी सफेद है।

थाम अनुभवों की पोटली

धरोहर ये अनमोल है।

 

थामां था जिनका हाथ

पकड़ उंगलिया हम बड़े हुए।

बनकर हमारी ढाल जो

जो दिन रात खड़े हुए।

 

कहानियां छिपी हुई है

जिनके झुर्रियों के चेहरों पर।

यादों के झरोखे में खड़े

दिखे वो हमें ताकते हुए।

 

देते है आशीर्वाद वो हमें

अपनी सूखी हथेलियों से।

नहीं बोझ वो है घर के,

ये रौनक घर के है हुए।

 

ठहराव जब पाया इन्होंने

हम बस भागते ही मिले।

थामा जिन्होंने था हाथ कभी

हम न थामते इन्हें मिले।

 

ये देव है हमारे आशीर्वाद भी यही

सुनकर इनकी बात को महत्व दीजिए

ये गए तो न मिलेंगे हमें कभी

दिखे अगर कभी तस्वीर के हुए।

 

मीना तिवारी

पुणे

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