महोली,( सीतापुर,)
ग्राम पंचायतों को वित्तीय रूप से सशक्त एवं आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से ‘ग्राम पंचायतों द्वारा स्वयं के स्रोत से राजस्व सृजन विषय पर एक दिवसीय क्षमता संवर्धन प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रशिक्षण का उद्देश्य ग्राम पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों एवं पंचायत कार्मिकों को स्थानीय संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन, कर एवं गैर-कर राजस्व के स्रोतों, परिसंपत्ति प्रबंधन तथा वित्तीय आत्मनिर्भरता की अवधारणा से व्यवहारिक रूप में परिचित कराना था।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्तर के मास्टर ट्रेनर बालेन्दु मिश्र ने कहा कि ग्राम पंचायतों की वास्तविक सशक्तता केवल सरकारी अनुदानों पर निर्भर रहने से नहीं, बल्कि अपने वैधानिक अधिकारों एवं स्थानीय संसाधनों के प्रभावी उपयोग से प्राप्त होती है। उन्होंने भारतीय संविधान के 73वें संविधान संशोधन, अनुच्छेद 243 एच, राज्य वित्त आयोग, वित्त आयोग की अनुशंसाओं तथा उत्तर प्रदेश पंचायती राज व्यवस्था के संदर्भ में ग्राम पंचायतों की वित्तीय स्वायत्तता पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने प्रतिभागियों को बताया कि पंचायत की प्रत्येक परिसंपत्ति जैसे पंचायत भवन, हाट-बाजार, तालाब, दुकानें, सामुदायिक भवन, ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था तथा अन्य स्थानीय संसाधन यदि वैज्ञानिक एवं पारदर्शी ढंग से प्रबंधित किए जाएँ, तो वे पंचायत के लिए स्थायी आय का स्रोत बन सकते हैं। प्रशिक्षण के दौरान गुजरात की धर्मज, महाराष्ट्र के हिवरे बाज़ार, उत्तर प्रदेश की जालाबपुर गुड़ाल तथा अन्य सफल ग्राम पंचायतों के उदाहरणों के माध्यम से व्यवहारिक मॉडल प्रस्तुत किए गए।
राज्य स्तरीय प्रशिक्षक हरिओम शुक्ल ने उत्तर प्रदेश में ओ एस आर की व्यवहारिक कार्यप्रणाली, परिसंपत्तियों की पहचान, राजस्व क्षमता का आकलन, ग्राम पंचायत विकास योजना के समावेशन तथा प्रभावी उपयोग पर विस्तृत जानकारी दी।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों ने अपनी ग्राम पंचायतों में स्थानीय संसाधनों के बेहतर प्रबंधन, वैधानिक राजस्व स्रोतों के प्रभावी उपयोग तथा वित्तीय आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम उठाने का संकल्प लिया।
*इस प्रशिक्षण का प्रमुख संदेश*
“आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत की पहचान केवल प्राप्त अनुदानों से नहीं, बल्कि स्वयं के स्रोतों से सतत एवं पारदर्शी राजस्व सृजन की क्षमता से होती है।”






