धूप छांव की लेकर छाया।
उपनामों की लेकर माया।
चेतन और अवचेतन मन से।
जीवन तो चलता रहता है।
तन मन के वाहन लेकर।
मान और अपमानो को सह।
मंजिल की गति को पता है।
जीवन तो चलता रहता है।
कभी सुबह कभी सांझ दिखा।
कर्मो का एहसास कराता।
हार जीत के गीतों को सुनाता।
जीवन तो चलता रहता है।
जीवन के मुखौटे पहनाकर।
भटकी गलियों में भटकाकर।
नाजुकता के हाथ थमाकर।
जीवन तो चलता रहता है।
कुछ व्यक्त और अव्यक्त कराकर।
धैर्य पलो का साथ थमाकर।
हसता और कभी रुलाकर।
जीवन तो चलता रहता है।
अभी समय कुछ काम करो।
कुछ अच्छे सच्चे से नाम करो।
खुद की तुम पहचान करो।
जीवन ऐसे ही तब चलता है।
स्वरचित एवम अप्रकाशित
मीना तिवारी
पुणे






