खिड़की के उस पार…,
कुछ यादें धुंधली सी ठहरी हैं,
जैसे -तेरे आँखों की नमी,
जो अब भी हवाओं में बिखरी हुई है,
खिड़की पर जब भी बारिश की बूंदें गिरती हैं,
तो वो तेरा ही नाम लिख कर जाती हैं,
और मैं हर बार उन्हें छूकर,
तुम्हे महसूस करती हूँ जैसे कि,
वो शामें, वो बातें, वो वादे,
जो सब कुछ तो धुंध में लिपटी हुई खड़ी सी हैं,
मगर,तुम्हारा जाना ऐसा था -कि,
आज भी दिल वहीं रुका पड़ा है,
खिड़की के उस पार…,
शायद…!
तुम किसी और ही दुनिया में मुस्कुराते होगे,
और…इस पार -मैं,
तेरी यादों की चादर को ओढ़े हुए,
हर रात तन्हा ही सो जाती हूँ,
चाँद जब भी मेरी चौखट पर आता है,
हर बार उसकी रोशनी में हर बार,
तुम्हारा ही अश्क ही उभरता है,
खिड़की के उस पार…,
और मेरी आँखों का समंदर,
जो हर रात तेरे नाम पर,
चुपचाप बह जाती है ||
*शशि कांत श्रीवास्तव*
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब






