कुर्सी का खेल

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व्यंग्य गीतिका

कुर्सी के पीछे-पीछे भागूँ,

सारा जग अपना कर लूँगा।

जिस दिन हाथ लग गई सत्ता,

नक्शा अपना गढ़ लूँगा।

 

मीठे-मीठे बोल सुनाकर,

मन की बातें छिपा लूँगा।

वादों की रंगीन पतंगें,

आसमान में उड़ा दूँगा।

 

कल तक जो थे साथ हमारे,

आज उन्हें अनजान कहूँगा।

काम पड़े तो गले लगाऊँ,

काम गया तो ध्यान न दूँगा।

 

सच बोले जो सामने मेरे,

उससे आँख चुरा लूँगा।

गलती मानने के बदले,

दोष किसी पर मढ़ दूँगा।

 

जनता जब हिसाब माँगेगी,

नया सवाल उठा दूँगा।

सूखे खेत, खाली घर हों,

फिर भी मेले सजा दूँगा।

 

इतिहासों की धूल झाड़कर,

अपनी गाथा लिखवा दूँगा।

जिस पन्ने में दोष दिखेगा,

उस पन्ने को ही जला दूँगा।

 

जाति-धर्म के नाम उछालकर,

भीड़ अलग-थलग कर दूँगा।

टूटे मन के बीच खड़ा मैं,

अपना झंडा गाड़ दूँगा।

 

मुझसे आगे कौन बढ़ेगा,

ऐसा भ्रम भी पालूँगा।

मेरी जय में स्वर न मिले तो,

उस स्वर को ही टालूँगा।

 

देश बड़ा है, बात बड़ी है,

फिर भी खुद को बड़ा बताऊँ।

अपना चेहरा चमकाने को,

दर्पण तक को दोषी ठहराऊँ।

 

कुर्सी मेरी, नाम मेरा हो,

ऐसा सपना मैं देखूँगा।

जनसेवा की ओट लगाकर,

निज स्वार्थों को साधूँगा।

 

लेकिन जनता चुप कब रहती,

एक दिन पर्दा खोल देगी।

झूठी चमक उतरते ही फिर,

सच्चाई सब बोल देगी।

 

तब मैं अपने कर्म गिनूँगा,

किस-किस को क्या दे पाया?

कुर्सी तो पल भर की निकली,

जनमन ही था सच्चा साया।

 

जिसने जन को छलना चाहा,

वह खुद ही एक दिन हारा।

राजमहल भी सूना होता,

जब रूठे जन का द्वारा।

 

कुर्सी आती-जाती रहती,

जनता रहती देश की शान।

जो जनमन का मान बचाए,

वही कहलाए सच्चा इंसान।

 

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

चन्दौसी, जनपद संभल

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