मुट्ठी भर चाहे मन

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मुट्ठी भर मन चाहे खुशियाँ,

जाने कितनी अभी दुरियाँ।

 

वर्षों से रख्खी अर्जी है.

जाने क्या उसकी मर्जी है,

भींग रहा है मन पलकों में,

झर. झर. नीर बहा करती हैं,

पाँव खींचती कितनी रूढियां।

जाने कितनी अभी दूरियां।

 

सब बस्ते में पड़े खिलौने,

बेच रही हूँ औने -पौने,

उस टीले पर रख आयी हूँ,

बचपन के सब स्वप्न सलोने।

रुला रही हैं मजबूरियां।

जाने कितनी अभी दूरियाँ।

 

मन के अकल्पित स्वप्न सुनहरे,

लगे साधना में सब गहरे,

शायद अभी आस है बाकी,

होगी पूरी सुबह सबेरे।

लेकिन सब कब होते पूरे।

धरती से है बादल की दूरियां।

 

दरक रहा विश्वास का कोना,

छिपा रखा जहाँ मन का सोना,

फर्श फर्श पर भाव बिछे हैं,

डर लगता है उसको छूना,

सूत वो कच्चे बाँध आई है।

कब बाँटेगी खीर पूरियाँ।

 

संगीता श्रीवास्तव

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