विविध

खिड़की के पार

खिड़की के उस पार..., कुछ यादें धुंधली सी ठहरी हैं, जैसे -तेरे आँखों की नमी, जो अब भी हवाओं में बिखरी हुई है, खिड़की पर जब भी बारिश...

सपने आँखों में हमारे जो बताएंँ कैसे।

बेड़ियाँ रोक रहीं पांँव हैं जाएंँ कैसे।   पंख फैलाके भी जो उड़ न सका हो पंछी हम वही हैं मगर ये बात जताएँ कैसे।.   कहती हूँ पांँव...

बेशुमार प्यार और आशीष को सादर

हमारी सभी अद्भुत अमेज़न कृतियों की हेड, लाइन प्रथम पेज सब कुछ मात्र पांच मिनट में उसी समय तय होता हैं हमने कभी प्रकाशक सागर जख़्मी...

मशीनों के जंगल में

मुखड़ा कल की नस में आज बहे, मन का अपना रक्त रहे, मशीनों के जंगल में भी मन का एक वृक्ष रहे।   नीली-नीली स्क्रीनें हों, खिड़की पर हो धूप, अँगुलियों में...

संवेदना से शाश्वत सत्य तक : रविशंकर शुक्ल का काव्य संसार

डा. सीमांत प्रियदर्शी रायबरेली के वरिष्ठ रचनाकार श्री रविशंकर शुक्ल जी की कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिल...

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