गीत नहीं आते अधरों पर
आंँखें जब दो रोती हैं।
पेट भरा रहता है जिनका,
बस उनसे यह होती हैं।
खोज़ रहे दो रोटी जो हैं,
गीत भला क्या गायेंगे।
दिन भर मजदूरी हैं करते,
तब भोजन कुछ पायेंगे।
धनवानों की महफ़िल सजती,
वही गीत को गाते हैं।
सबके हिस्से नहीं ठाठ यह,
भाव नहीं आ पाते हैं।
वैरागी लोगों को छोड़ो,
उनकी अलग कहानी है।
पीर बसा जिसके दिल में है,
गीत रीति कब जानी है।।
गीत नहीं आते अधरों पर,
जब मन व्याकुल होता है।
टूट रहे सपनों पर खाली,
बेबस होकर रोता है।
माया भी कब साथ निभाती,
देह शिथिल हो जाता है।
अपने भी दूरी हैं रखते,
प्रीति कहांँ मन पाता है।।
डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’
दिल्ली-एनसीआर






