ज़िंदगी को हमेशा मुक़म्मल होने की ज़िद नहीं होती,कभी-कभी वह कुछ अधूरे ख़्वाबों की ओट में भी पूरी तरह मुस्कुराती है। हर चाहत का पूरा होना ज़रूरी नहीं; कुछ इच्छाएँ अधूरी रहकर ही हृदय में धड़कती रहती हैं,जैसे भोर से पहले आकाश में ठहरा कोई तारा! कुछ रास्ते मंज़िल तक़ नहीं पहुँचते,फ़िर भी उनके पदचिह्न हमें अपने भीतर तक़ ले जाते हैं।कुछ रिश्ते नाम नहीं पा सके, फ़िर भी आत्मा की स्मृतियों में उनकी आहट बनी रहती है। शायद जीवन का सौंदर्य सब कुछ पा लेने में नहीं,बल्कि जो नहीं मिला, उसकी कमी में भी अस्तित्व का अर्थ ख़ोज लेने में है ; क्योंकि हर अधूरापन अभाव नहीं होता,कुछ अधूरेपन ही जीने की सबसे सुंदर वज़ह बन जाते हैं।
-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद गुजरात।






