बहू कई दिनों से सोच रही थी कि इस साल अपने पति का जन्मदिन कुछ ख़ास ढंग से मनाएगी। लेकिन सबसे बड़ी दिक़्क़त यही थी कि उसे सही तारीख़ ही नहीं पता थी। जब भी वह सासु माँ से पूछती –
“माँजी, इनका जन्मदिन कब है?”
तो सासु माँ हर बार सिर पर आँचल टिकाए मुस्कुराकर कहतीं –
“बहू , तिथि तो अब याद नहीं है… हाँ, इतना ज़रूर याद है कि गुड्डु की छठियारी दुर्गा पूजा के अवसर पर हुई थी।”कलशा रखेले हा उस दिन,
बहू झट से पूछ बैठती –
“अच्छा माँ, दुर्गा पूजा के किस दिन?”
सासु माँ की आँखें चमक उठतीं।
“हाँ, वो तो याद है बिटिया! जिस बरस गुड्डु की छठियारी हुई थी, उसी दिन गाँव में दुर्गा पूजा का कलशा रखाइल रहै। सारा टोला सज-धज के उमंग में डूबा था… उसी मंगल घड़ी में हम अपने लाल की छठियारी कर रहे थे।”
बहू हैरान रह जाती – पूजा और छठियारी का दिन साफ़ याद है, पर जन्म की असली तिथि क्यों नहीं!
एक दिन जब बहू ने ज़िद्द की, तो सासु माँ अलमारी से एक पुराना, तह किया हुआ कपड़ा निकाल लाईं।
वह था गुड्डु का छठियारी का पैंट।
माँ ने स्नेह से बहू के हाथों में वह पैंट थमाते हुए कहा –
“लो, इसे अब तुम सँभालो। यह कपड़ा बड़ा काम का है। कोर्ट–कचहरी में जब भी ले जाओगी, गुड्डु केस जीत जाएगा। भगवान न करे कभी संकट आए, पर यह निशानी बहुत भरोसेमंद है।”
बहू ने हैरत से पैंट को देखा और मुस्कुराकर बोली –
“ठीक है माँ, इसे सँभाल लेती हूँ… मगर सोच रही हूँ, जब आपके पास पूजा और छठियारी का दिन इतना साफ़ याद है, तो इनका जन्म किस तारीख़ को हुआ था, वो ही क्यों नहीं याद?”
सासु माँ हँसते-हँसते बोलीं –
“बहू , बेटा तो मेरा है… पर जन्मदिन का हिसाब–किताब अब तुम्हीं देखो!”
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बहू ने बहुत सोचा। आखिरकार बच्चों की ख़ुशी के लिए उसने तय कर लिया कि एक दिन आशिवन महीना को ही अपने पति का जन्मदिन मान लिया जाए। अब हर साल उसी तारीख़ पर घर सजता है,
केक आता है और बच्चों की खिलखिलाहट से आँगन गूँज उठता है।
नया ज़माना है, तो फोटो भी खिंचते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट होते हैं –
“ हैप्पी बर्थडे टू द बेस्ट डैड ”
दोस्तों और रिश्तेदारों के ढेरों लाइक्स और शुभकामनाओं से माहौल और भी उत्सवमय हो जाता है।
इस तरह, भले ही गुड्डु का असली जन्मदिन भूला गया, पर बच्चों की मासूम ख़ुशी और बहू के प्रेम ने उस एक तयशुदा दिन को हमेशा के लिए यादगार बना दिया।
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कवयित्री ज्योति बरनवाल,
नवादा (बिहार)






