आ चलो काट लें अवशेष ज़िन्दगी के पल जिंदादिली से, जो बाकी रह जाएं झरोखे में, उसे आपस में बांट लें।
वो नीले समंदर के किनारे,पिघले मोती से अंगारे,चलो ख्वाहिशों की मुट्ठी में अपने बांध लें,वो रंगीन लम्हें जिंदादिली के सारे,खुशी की चादर ओढ़े पलकों की बाहों में थाम लें,धूप-छाँव के खेल हैं निराले,कुछ अपनी किस्मत के प्याले,तो कुछ बुलबुले हैं आले, प्रेम की वर्षा कर जिंदगी में सारे रंग भर दें, लम्हे बचें जो जिंदगी के वो हंस-हंस के काट लें,जो बाकी रह जाए झरोखे में उसे आपस में बांँट लें।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।
23-09-26






