*दो अक्टूबर : गांधी जयंती पर एक आत्ममंथन
मोबाइल हमारे हाथ में है, लेकिन क्या विवेक भी हमारे साथ है?
दो अक्टूबर केवल गांधी जयंती मनाने का दिन नहीं, बल्कि अपने भीतर झाँकने और अपने आचरण की समीक्षा करने का अवसर भी है। हम हर वर्ष महात्मा गांधी को याद करते हैं, उनके चित्र पर पुष्प अर्पित करते हैं और उनके विचारों की चर्चा करते हैं। लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि उनके संदेशों को हमारी बदलती जीवनशैली और डिजिटल युग के संदर्भ में समझा जाए।
बापू के तीन बंदर—बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो—आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। अंतर केवल इतना है कि आज हमारी आँखों, कानों और वाणी तक पहुँचने वाली सामग्री का संसार बहुत विस्तृत हो गया है। मोबाइल की एक छोटी-सी स्क्रीन पूरी दुनिया हमारे सामने ले आती है। वीडियो कॉल, ऑडियो कॉल, वॉइस नोट और सोशल मीडिया ने संवाद को आसान और तीव्र बनाया है।
लेकिन यहाँ जिम्मेदारी केवल देखने, सुनने और बोलने वाले की नहीं है। जिम्मेदारी उस व्यक्ति की भी है जो कुछ दिखा रहा है, सुना रहा है, बोल रहा है, लिख रहा है और समाज के सामने परोस रहा है।
यहीं से बापू के तीन बंदरों की सीख का एक नया अर्थ सामने आता है।
*बुरा मत दिखाओ*
पहला संदेश केवल देखने वाले के लिए नहीं है। जो कुछ समाज के सामने प्रस्तुत कर रहा है, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। सोशल मीडिया पर लोकप्रियता, लाइक, व्यूज़ और फॉलोअर्स की दौड़ में यदि अश्लीलता, हिंसा, अपमान, झूठ, सनसनी या किसी की निजी जिंदगी को तमाशे की तरह प्रस्तुत किया जाए, तो प्रश्न केवल दर्शक की दृष्टि का नहीं, प्रस्तुतकर्ता की जिम्मेदारी का भी है।
हर वह चीज जो दिखाई जा सकती है, जरूरी नहीं कि समाज को दिखाई भी जाए।
इसलिए डिजिटल मंच पर सामग्री प्रस्तुत करने वालों को स्वयं से पूछना चाहिए—
क्या मैं समाज को वही दे रहा हूँ जिसे देखकर समाज बेहतर बनेगा, या केवल वही जिसे देखकर मेरी लोकप्रियता बढ़ेगी?
*बुरा मत सुनाओ*
आज ऑडियो कॉल, पॉडकास्ट, वॉइस नोट और अनेक डिजिटल माध्यमों से विचार और सूचनाएँ बहुत तेजी से फैलती हैं। लेकिन किसी अपुष्ट सूचना, अफवाह या किसी व्यक्ति के बारे में कही गई अधूरी बात को आगे बढ़ाना केवल सुनने वाले की भूल नहीं है; उसे बिना सत्यापन समाज तक पहुँचाने वाले की भी जिम्मेदारी है।
जिस आवाज़ को हम हजारों लोगों तक पहुँचा सकते हैं, उसमें उतनी ही सावधानी भी होनी चाहिए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सत्य और सामाजिक उत्तरदायित्व भी जुड़ा है।
*बुरा मत बोलो*
आज केवल हमारी आवाज ही नहीं, हमारी उँगलियाँ भी बोलती हैं। एक टिप्पणी, पोस्ट, संदेश या वॉइस मैसेज कुछ ही क्षणों में सैकड़ों-हजारों लोगों तक पहुँच सकता है।
इसलिए बोलने और लिखने वाले के लिए भी एक प्रश्न होना चाहिए
क्या मेरे शब्द किसी विचार को जन्म दे रहे हैं या किसी व्यक्ति को चोट पहुँचा रहे हैं?
क्या मैं असहमति व्यक्त कर रहा हूँ या अपमान कर रहा हूँ?
क्या मैं प्रश्न उठा रहा हूँ या किसी की प्रतिष्ठा पर प्रहार कर रहा हूँ?
और दूसरी ओर, देखने-सुनने वाले की भी जिम्मेदारी है कि वह हर सामग्री को बिना सोचे स्वीकार या प्रसारित न करे।
यानी डिजिटल दुनिया में जिम्मेदारी दोनों तरफ की है।
जो गलत परोसता है, उसे यह समझना होगा कि हर व्यू सफलता नहीं होता और हर वायरल सामग्री समाज के लिए उपयोगी नहीं होती।
जो गलत देखता-सुनता है, उसे यह समझना होगा कि हर उपलब्ध सामग्री ग्रहण करने योग्य नहीं होती।
और जो गलत को आगे बढ़ाता है, उसे यह समझना होगा कि एक क्लिक भी किसी गलत बात को हजारों लोगों तक पहुँचा सकता है।
इसलिए सोशल मीडिया केवल देखने वालों का मंच नहीं है और न ही केवल बोलने वालों का। यह साझी जिम्मेदारी का संसार है।
यहाँ सामग्री बनाने वाले की जिम्मेदारी है कि वह क्या परोस रहा है;
देखने वाले की जिम्मेदारी है कि वह क्या स्वीकार कर रहा है;
सुनने वाले की जिम्मेदारी है कि वह क्या सत्य मान रहा है;
और साझा करने वाले की जिम्मेदारी है कि वह क्या आगे पहुँचा रहा है।
मोबाइल बदल गया, संवाद के माध्यम बदल गए और जीवन की गति बदल गई, लेकिन मनुष्य होने की जिम्मेदारी नहीं बदली।
तकनीक हमारे हाथ में शक्ति देती है। अब यह हम पर निर्भर है कि उस शक्ति से हम समाज में सत्य फैलाते हैं या सनसनी, संवेदना फैलाते हैं या विष, संवाद बढ़ाते हैं या विवाद।
इस गांधी जयंती पर इसलिए केवल बापू की तस्वीर पर पुष्प अर्पित करना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता है कि उनके संदेश को अपने डिजिटल व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए।
*दृष्टि में मर्यादा हो,*
*श्रवण में विवेक हो,*
*वाणी में संयम हो,*
और डिजिटल सामग्री में सत्य, शालीनता और सामाजिक उत्तरदायित्व हो।
चरखा भले ही आज हमारे हाथों में न हो, लेकिन सत्य और संवेदना का धागा आज भी हमारे हाथ में है।
आइए, दो अक्टूबर को बापू के तीन बंदरों को केवल एक प्रतीक के रूप में न देखें, बल्कि उनके संदेश को डिजिटल जीवन में उतारें।
*न बुरा दिखाएँ,*
*न बुरा देखें।*
*न बुरा सुनाएँ,*
*न बुरा सुनें।*
*न बुरा बोलें,*
*न बुरा लिखें।*
और न गलत को आगे बढ़ाएँ।
क्योंकि डिजिटल दुनिया को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी केवल यह तय करने की नहीं है कि हम क्या देखते, सुनते और बोलते हैं; बल्कि यह तय करने की भी है कि हम समाज के सामने क्या परोसते हैं।
यही आज के डिजिटल युग में
बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
— *साहित्यकार दया भट्ट दया*






