*राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का हिंदी के प्रति अनुराग, उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व – देश के प्रति*
*प्रस्तावना*
भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो नाम नहीं, विचार हैं। महात्मा गांधी ऐसा ही नाम है। मोहनदास करमचंद गांधी – एक दुबला पतला आदमी, हाथ में लाठी, तन पर धोती, पर जिसके एक इशारे पर पूरा देश उठ खड़ा होता था।
गांधी जी को हम केवल स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जानते हैं। पर गांधी जी एक भाषाविद भी थे, हिंदी के सबसे बड़े प्रेमी भी थे। उन्होंने कहा था –
*”राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।”*
यह एक वाक्य नहीं, पूरे राष्ट्र का भविष्य था। गांधी जी समझ गए थे कि अगर भारत को एक करना है तो एक भाषा चाहिए और वह भाषा हिंदी ही हो सकती है।
गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में हुआ था। उनकी माता पुतलीबाई और पिता करमचंद गांधी थे। बचपन में वे गुजराती बोलते थे, इंग्लैंड में अंग्रेजी सीखी, दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने देखा कि कैसे भाषा के कारण भारतीय अपमानित होते हैं। वहीं से उनके मन में हिंदी प्रेम का बीज पड़ा।
*1. गांधी जी का व्यक्तित्व – एक झलक*
गांधी जी का व्यक्तित्व बहुत सरल था पर बहुत गहरा था।
*क. सत्य के पुजारी*
गांधी जी ने अपनी आत्मकथा का नाम रखा – सत्य के साथ मेरे प्रयोग। My Experiments with Truth। वे कहते थे –
*”सत्य ही ईश्वर है।”*
बचपन में उन्होंने एक बार राजा हरिश्चंद्र नाटक देखा और तय कर लिया कि जीवन में कभी झूठ नहीं बोलेंगे। एक बार उन्होंने अपने पिता से झूठ बोला, फिर पूरी रात रोए और पिता को चिट्ठी लिख कर माफी माँगी। यही सत्य उनके जीवन का आधार बना।
*ख. अहिंसा के पुजारी*
गांधी जी कहते थे –
*”अहिंसा केवल न मारना नहीं है, किसी के प्रति बुरा सोचना भी हिंसा है।”*
उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में देखा कि भारतीयों को कुली कहा जाता है। उन्हें ट्रेन से फेंक दिया गया। पर उन्होंने बदला नहीं लिया। उन्होंने सत्याग्रह किया – सत्य के लिए आग्रह।
*ग. सादगी के पुजारी*
गांधी जी वाइसराय से मिलने भी धोती में जाते थे। एक बार इंग्लैंड के राजा ने कहा – आप तो अधनंगे फकीर हैं। गांधी जी हँसे और बोले – फकीर ही तो हूँ, पर इस देश का फकीर हूँ।
वे कहते थे – सादा जीवन, उच्च विचार।
*घ. कर्मयोगी*
गांधी जी रोज सुबह 4 बजे उठते थे। चरखा कातते थे। कहते थे –
*”चरखा केवल सूत नहीं कातता, वह स्वतंत्रता कातता है।”*
वे हर काम अपने हाथ से करते थे। आश्रम में शौचालय तक स्वयं साफ करते थे।
*2. गांधी जी का हिंदी प्रेम – कब और कैसे जागा?*
*क. दक्षिण अफ्रीका में पहला अनुभव – 1893-1914*
गांधी जी 1893 में बैरिस्टर बन कर दक्षिण अफ्रीका गए। वहाँ उन्होंने देखा कि भारत से गए मजदूर – हिंदी, तमिल, गुजराती, बंगाली सब अलग बोलते हैं पर अंग्रेज सबको कुली कहते हैं।
वहाँ के भारतीयों को कोर्ट में दुभाषिए की जरूरत पड़ती थी। गांधी जी ने सोचा – अगर भारतीयों की एक भाषा होती तो अंग्रेज हमें बाँट नहीं पाते।
1906 में जोहान्सबर्ग में उन्होंने इंडियन ओपिनियन नाम का अखबार निकाला। उसमें वे गुजराती, हिंदी, तमिल में लिखते थे। उन्होंने देखा कि हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जिसे उत्तर भारत के सभी मजदूर समझ लेते हैं।
उन्होंने लिखा –
*”दक्षिण अफ्रीका में मैंने देखा कि हिंदी ही वह धागा है जो सभी भारतीयों को पिरो सकता है।”*
*ख. 1916 में कांग्रेस अधिवेशन – पहला ऐलान*
1916 में लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी पहली बार बड़े मंच पर आए। वहाँ उन्होंने देखा कि कांग्रेस के नेता अंग्रेजी में भाषण देते हैं और जनता नीचे बैठी कुछ नहीं समझती।
उन्होंने कहा –
*”आप अंग्रेजी में बोलते हैं, जनता हिंदी समझती है। यह कैसा स्वराज्य होगा जहाँ नेता और जनता के बीच भाषा की दीवार हो?”*
*ग. 1917 में भरूच में ऐतिहासिक भाषण – गुजरात शिक्षा परिषद*
20 अक्टूबर 1917 को भरूच में गुजरात एजुकेशनल कांफ्रेंस हुई। वहाँ गांधी जी ने अध्यक्षीय भाषण हिंदी में दिया। यह बहुत बड़ी बात थी क्योंकि वे गुजराती थे।
उन्होंने कहा –
*”राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।”*
और आगे कहा –
*”अंग्रेजी को हमने हृदय में स्थान दे दिया है, यह हमारी गुलामी का सबसे बड़ा प्रमाण है।”*
उन्होंने कहा कि मैं गुजराती हूँ पर मेरे लिए हिंदी पराई नहीं है। हिंदी मेरी भी मातृभाषा है।
*घ. 1918 में इंदौर में हिंदी साहित्य सम्मेलन – सबसे बड़ा ऐतिहासिक क्षण*
1918 में इंदौर में आठवाँ हिंदी साहित्य सम्मेलन हुआ। गांधी जी को उसका सभापति बनाया गया। यह उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिंदी प्रेम का क्षण है।
वहाँ उन्होंने ऐतिहासिक भाषण दिया। उसके कुछ अंश –
*1. “हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।”*
*2. “हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।”*
*3. “यदि स्वराज्य अंग्रेजी में होगा तो वह स्वराज्य नहीं होगा। वह अंग्रेजों का ही राज्य होगा, केवल शासक बदल जाएँगे।”*
*4. “मैं दक्षिण में जाता हूँ तो देखता हूँ कि वहाँ भी लोग थोड़ी बहुत हिंदी समझ लेते हैं। पर उत्तर वाला तमिल, तेलुगू नहीं समझता। इसलिए हिंदी ही संपर्क भाषा बन सकती है।”*
*5. “हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना है तो हमें अहिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी का प्रचार करना होगा। मैं स्वयं तमिलनाडु, केरल में हिंदी प्रचार के लिए आश्रम खोलूँगा।”*
यह भाषण सुन कर हिंदी के बड़े विद्वान रो पड़े। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा – आज हिंदी को उसका सच्चा पुत्र मिल गया।
*ङ. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना – 1918*
इंदौर सम्मेलन के तुरंत बाद गांधी जी ने अपने पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण भारत भेजा। और 1918 में मद्रास में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की।
गांधी जी ने कहा –
*”हिंदी प्रचार का काम राष्ट्रीय काम है। यह उत्तर का दक्षिण पर उपकार नहीं है, यह पूरे राष्ट्र को एक करने का यज्ञ है।”*
आज उस सभा की 20 से ज्यादा शाखाएँ हैं और लाखों दक्षिण भारतीय हिंदी सीख चुके हैं। यह गांधी जी के हिंदी प्रेम का जीवंत प्रमाण है।
गांधी जी के सुपुत्र देवदास जी ने तमिलनाडु में घर घर जा कर हिंदी पढ़ाई। वे नंगे पाँव चलते थे, कहते थे – मैं हिंदी का भिखारी हूँ, मुझे हिंदी के लिए भीख दो।
*च. वर्धा और सेवाग्राम में हिंदी प्रयोग*
1921 में गांधी जी ने वर्धा में आश्रम बनाया। वहाँ उन्होंने नियम बनाया – आश्रम में केवल हिंदी और मातृभाषा बोली जाएगी, अंग्रेजी नहीं।
वे अपने आश्रम में आने वाले हर पत्र का उत्तर हिंदी में देते थे। अगर कोई अंग्रेजी में पत्र लिखता तो वे हिंदी में उत्तर देते।
एक बार एक अंग्रेज कलेक्टर ने उनसे अंग्रेजी में बात की। गांधी जी ने हिंदी में जवाब दिया। कलेक्टर ने कहा – मुझे हिंदी नहीं आती। गांधी जी ने कहा – तो सीखिए, मैं आपके देश में अंग्रेजी सीखता हूँ, आप मेरे देश में हिंदी सीखिए।
*छ. हरिजन और नवजीवन में हिंदी*
गांधी जी तीन अखबार निकालते थे – यंग इंडिया अंग्रेजी में, हरिजन बंधु गुजराती में और हिंदी नवजीवन हिंदी में।
हिंदी नवजीवन में वे सरल हिंदी लिखते थे। उनकी हिंदी में संस्कृत के कठिन शब्द नहीं होते थे। वे कहते थे –
*”हिंदी ऐसी होनी चाहिए जिसे आम आदमी समझ सके। पंडितों की हिंदी नहीं, जनता की हिंदी।”*
उनकी हिंदी का नमूना देखिए –
*”मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसकी मजदूरी दे दो।”*
कितनी सरल, कितनी सुंदर हिंदी।
*3. गांधी जी का कृतित्व – देश के लिए*
गांधी जी ने देश के लिए जो किया, वह इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा है।
*क. सत्याग्रह – एक नया हथियार*
गांधी जी ने दुनिया को नया हथियार दिया – सत्याग्रह। सत्य + आग्रह = सत्य के लिए आग्रह।
उन्होंने कहा –
*”अन्याय के सामने झुकना पाप है।”*
दक्षिण अफ्रीका में 1906 से 1914 तक उन्होंने सत्याग्रह किया और वहाँ के भारतीयों को सम्मान दिलाया।
भारत में उन्होंने तीन बड़े सत्याग्रह किए –
1. चंपारण सत्याग्रह 1917 – बिहार में नील के किसानों के लिए। यह भारत में उनका पहला सत्याग्रह था।
2. खेड़ा सत्याग्रह 1918 – गुजरात के किसानों के लिए।
3. अहमदाबाद मिल मजदूर हड़ताल 1918 – मजदूरों के लिए।
इन तीनों में वे जीते।
*ख. असहयोग आंदोलन 1920*
1920 में गांधी जी ने कहा – अंग्रेजों के साथ सहयोग मत करो। स्कूल छोड़ो, अदालत छोड़ो, नौकरी छोड़ो।
उन्होंने कहा –
*”असहयोग पाप के साथ असहयोग है, पापी के साथ नहीं।”*
इस आंदोलन में लाखों छात्र स्कूल छोड़ कर आए। मोतीलाल नेहरू, चित्तरंजन दास जैसे बड़े वकीलों ने वकालत छोड़ दी। यह देश का पहला जन आंदोलन था।
*ग. दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह 1930*
1930 में अंग्रेजों ने नमक पर कर लगाया। गांधी जी ने कहा – नमक तो प्रकृति की देन है, उस पर कर कैसा?
12 मार्च 1930 को वे अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से दांडी तक पैदल चले – 384 किलोमीटर। 24 दिन चले। 6 अप्रैल को उन्होंने समुद्र के पानी से नमक बनाया और कानून तोड़ा।
उन्होंने कहा था –
*”मैं नमक कानून तोड़ कर सरकार की बुनियाद हिला दूँगा।”*
यह देख कर पूरी दुनिया चौंक गई।
*घ. भारत छोड़ो आंदोलन 1942*
8 अगस्त 1942 को बॉम्बे में गांधी जी ने कहा –
*”करो या मरो। Do or Die।”*
*”हम भारत को या तो आजाद कराएँगे या आजादी की कोशिश में मर जाएँगे।”*
यह उनका सबसे बड़ा आह्वान था। इसके बाद अंग्रेज समझ गए कि अब भारत को रोकना असंभव है।
*ङ. स्वदेशी और स्वावलंबन*
गांधी जी कहते थे –
*”स्वदेशी में ही स्वराज्य है।”*
उन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाई। चरखा कातने को कहा।
*”चरखा चलाना भी देशभक्ति है।”*
आज खादी फिर फैशन बन गई है पर गांधी जी के लिए खादी आत्मसम्मान थी।
*च. हिंदू मुस्लिम एकता और हरिजन उद्धार*
गांधी जी कहते थे –
*”हिंदू मुसलमान दोनों भारत माता की दो आँखें हैं।”*
वे हमेशा एकता के लिए उपवास करते थे।
हरिजनों के लिए उन्होंने कहा –
*”हरिजन ईश्वर के जन हैं। उन्हें अछूत कहना पाप है।”*
उन्होंने हरिजन आश्रम बनाया, स्वयं हरिजनों के साथ रहे।
*4. गांधी जी के हिंदी संबंधी अनमोल कोटेशन*
गांधी जी ने हिंदी के बारे में 50 से ज्यादा महत्वपूर्ण बातें कही हैं। उनमें से कुछ –
1. राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।
2. हिंदी ही हिंदुस्तान को एक कर सकती है।
3. अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाना राष्ट्र के प्रति पाप है।
4. यदि हमने हिंदी को नहीं अपनाया तो हम गुलामी से कभी नहीं निकलेंगे।
5. हिंदी का विरोध करने वाला भारत का विरोधी है।
6. मेरी मातृभाषा गुजराती है पर मेरी राष्ट्रभाषा हिंदी है।
7. दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार करना उत्तर भारत का कर्तव्य है।
8. हिंदी को सरल बनाओ, ताकि वह सबकी बन सके।
9. स्वराज्य का अर्थ है अपनी भाषा में राज।
10. मैं चाहता हूँ कि हिंदुस्तान का हर बच्चा हिंदी सीखे और हर प्रांत की भाषा का आदर करे।
*5. गांधी जी का व्यक्तित्व और हिंदी – एक आत्मा दो रूप*
गांधी जी का व्यक्तित्व और हिंदी प्रेम अलग नहीं हैं।
वे सत्यवादी थे, हिंदी सत्य की भाषा है। तुलसी, कबीर ने सत्य ही कहा।
वे अहिंसावादी थे, हिंदी अहिंसा की भाषा है। हिंदी में गाली भी मीठी लगती है।
वे सरल थे, हिंदी सरल है।
वे सबको साथ ले कर चलते थे, हिंदी सबको साथ ले कर चलती है। हिंदी ने उर्दू, फारसी, तमिल, अंग्रेजी सबको अपनाया।
इसलिए गांधी जी और हिंदी एक दूसरे के पूरक हैं।
*6. वर्तमान में गांधी जी के हिंदी विचारों की प्रासंगिकता*
आज 2026 में जब हम देखते हैं तो लगता है कि गांधी जी कितने दूरदर्शी थे।
आज नई शिक्षा नीति 2020 कहती है – प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में हो। यह गांधी जी का ही विचार था। गांधी जी ने 1937 में वर्धा शिक्षा योजना में कहा था – शिक्षा मातृभाषा में हो।
आज गूगल, फेसबुक हिंदी में है। यह गांधी जी का सपना था कि हिंदी तकनीक की भाषा बने।
आज दक्षिण भारत में हिंदी फिल्में, हिंदी गाने सबसे ज्यादा देखे जाते हैं। यह दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा का ही परिणाम है।
आज संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में काम होता है। अटल बिहारी वाजपेयी ने 1977 में पहली बार हिंदी में भाषण दिया। वह गांधी जी के विचार का ही विस्तार था।
*7. निष्कर्ष*
गांधी जी ने कहा था –
*”मेरे मरने के बाद मेरे शरीर को भले ही जला देना, पर मेरे विचारों को मत जलाना।”*
गांधी जी का सबसे बड़ा विचार था – हिंदी।
उन्होंने देश को आजादी दिलाई, यह उनका कृतित्व है। उन्होंने देश को हिंदी दी, यह उनका व्यक्तित्व है।
कृतित्व से देश स्वतंत्र हुआ, व्यक्तित्व से देश एक हुआ।
आज जब हम हिंदी में बात करते हैं, हिंदी में लिखते हैं, हिंदी में सोचते हैं, तो अनजाने में हम गांधी जी को ही याद करते हैं।
गांधी जी ने कहा था –
*”हिंदी रहेगी तो भारत रहेगा, भारत रहेगा तो विश्व में शांति रहेगी।”*
इसलिए गांधी जी केवल राष्ट्रपिता नहीं, हिंदी के पिता भी हैं।
हमारा कर्तव्य है कि हम गांधी जी के हिंदी प्रेम को आगे बढ़ाएँ। घर में हिंदी बोलें, बच्चों को हिंदी पढ़ाएँ, दक्षिण भारत के भाई बहनों को प्रेम से हिंदी सिखाएँ।
यही गांधी जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जय हिंद, जय हिंदी, जय गांधी।
लेखिका; अन्नपूर्णा मालवीया सुभाषिनी संस्कृत प्रवक्ता
गौरी पाठशाला इन्टर कॉलेज प्रयागराज उत्तर प्रदेश
नोट: यह आलेख मौलिक एवं अप्रकाशित है
दिनांक: 29/09/2026






