1.)जैसा कर्म करोगे, परमात्मा वैसा ही फल देगा।कर्म करो,फल की चिंता मत करो। निष्काम भाव से कर्म मेंरहो।स्वधर्म श्रेष्ठ और परधर्म निकृष्ट है।कर्म में कुशलता योग है।सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ।जब जब धर्म की हानि और अधर्म में बढ़ोतरी होती है, मैं स्वयं का सृजन करता हूं।आदि आदि उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता में महर्षि वेदव्यास द्वारा श्रीकृष्ण नामक पात्र के श्री मुख से कहलवाये हैं। पिछले पांच हजार वर्षों,तीन हजार वर्षों,एक हजार वर्ष, पांच सौ वर्ष,दो सौ वर्ष या पिछले अस्सी वर्ष के कालखंड में उपरोक्त श्लोक कहीं लागू होते हैं या नहीं? राजनीति, मजहब, संप्रदाय,मत,वाद, व्यापार, खेती-बाड़ी, किसान, मजदूर, शिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि किसी में इन श्लोकों को लागू करके देखिए और सत्यनिष्ठा से कहिये कि कि सच और झूठ क्या है?
2.) श्रीमद्भगवद्गीता में मौजूद 700 श्लोकों में सीधे -सीधे यह वक्तव्य कहां पर दिया गया है कि जैसा कर्म करोगे, परमात्मा वैसा ही फल देगा?एक भी श्लोक ऐसे अर्थ को नहीं कहता लगता है। हां,बाद में श्रीमद्भगवद्गीता के सैंकड़ों व्याख्याकारों ने ऐसा सिद्ध करने की कोशिश अवश्य की है। जनसाधारण हो या विशिष्टजन हो – श्रीमद्भगवद्गीता को सीधे न पढ़कर व्याख्याओं के माध्यम से समझता आया है। गड़बड़ी यहीं पर होती है।भ्रम इसी तरह से उत्पन्न होते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महर्षि वेदव्यास ने वेदों में निहित कर्म और फल के दर्शनशास्त्र को दुनिया में सबसे बेहतर ढंग से समझाया है। लेकिन मजहब और संप्रदाय की आड़ में दुकानदारी करने वालों ने ‘मनुर्भव’ के वैदिक उपदेश को भूलाकर एक ऐसे मनुष्य का निर्माण करने का प्रयास किया है जो भयभीत हो, डरपोक हो तथा किसी का दास हो। इन्होंने मनुष्य की स्वतंत्रता को छीन लिया है।एक जिम्मेदार मनुष्य की जगह पर इन्होंने एक गुलाम मनुष्य का निर्माण करने का प्रयास किया है। क्योंकि ऐसी हालत में ही बिचौलियों और दलालों की भूमिका आवश्यक हो जाती है। जैसे मंडी में किसान अपनी फसल को सीधे न बेचकर दलालों के माध्यम से बेचने को विवश हैं, ठीक वैसे ही ‘मनुर्भव’ के लिये किसी न किसी तथाकथित धर्मगुरु के पास जाना ही होगा। अधिकांश धर्मगुरुओं ने कैसे अंधभक्तरुपी गुलाम और दास तैयार किये हैं, सबके सामने है।
3.) दुनिया के परिदृश्य पर दृष्टि डालकर निष्पक्षता से बतलाओ कि ज्ञात इतिहास में मौजूद कितने महत्वाकांक्षी नेता, शोषक धर्मगुरु, ढोंगी सुधारक, लूटेरे व्यापारी, धन्ना सेठ पूंजीपति, भ्रष्टाचारी उच्च- अधिकारी, क्रूर शासक और प्रशासक, अन्यायी न्यायाधीश, बेखौफ अपराधी, कलंकित दुराचारी,निडर अनाचारी,मनमाने चोर और डाकू, उन्मुक्त भ्रष्टाचारी, नरसंहारी हमलावर और आक्रमणकारी,निठल्ले प्रोफेसर, व्यापारी चिकित्सक आदि को उनके दुष्कर्मों का बुरा फल मिला है? बिना शब्दों,सिद्धांतों और पुनर्जन्म के जाल में उलझाये इनका जवाब देने की हिम्मत करके दिखलाओ। व्यावहारिक जमीनी धरातल की बात करो,हवा -हवाई बातें नहीं।कौन ऐसी शक्ति कहीं पर बैठकर या कण- कण में वर्तमान होकर कर्मानुसार फल प्रदान करती है? यदि करती है तो उपरोक्त उदाहरणों का समाधान करके दिखलाओ।यह समस्त ब्रह्माण्ड परमपिता परमात्मा द्वारा निर्धारित नियमानुसार चल रहा है -इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं है। लेकिन किस तरह से चल रहा है – यह तो बतलाओ? चहुंओर दृष्टि डालने से ऐसा लग तो नहीं रहा है कि कोई शक्ति पल- प्रतिफल या वर्ष- प्रतिवर्ष या जन्म- प्रति जन्म ऐसा कर रही होगी। यदि दूसरे जन्मों में कर्म का फल मिलने की बात प्रस्तुत की जायेगी, तो संसार की सारी की सारी नैतिक, सामाजिक और न्यायिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी। आध्यात्मिक क्षेत्र में तो दूसरे जन्म में कर्म का फल मिलने की बात थोड़ी- बहुत सही हो सकती है, लेकिन सांसारिक क्षेत्र में तो कर्म का फल मिलने के लिये कोई मेहनतकश व्यक्ति वर्षों या आजीवन प्रतीक्षा कैसे कर सकता है?
4.)कोई भी नेता, धर्मगुरु, सुधारक, संत,योगी,व्यापारी, पूंजीपति,कोरपोरेट, न्यायाधीश, अपराधी, आतंकवादी, हमलावर आदि कर्म के फल के लिये दूसरे जन्मों की प्रतीक्षा नहीं करता है।उसे केवल अभी फल चाहिये। उसके आदेश का पालन अभी होना चाहिये।उसको अभी परिणाम चाहिये।यह व्यवस्था केवल सत्यनिष्ठ मेहनतकश लोगों पर ही क्यों थोपी जाती है? जिनके पास शक्ति,धन,सत्ता और बाहुबल है,वो तो अपने किये हुये कर्मों का फल तुरंत ले लेते हैं, लेकिन जो सत्यनिष्ठ, मेहनतकश, संवेदनशील, करुणामय और प्रेममय होते हैं,उनको कर्म के फल के लिये जन्मों तक प्रतीक्षा क्यों करनी पड़ती है?उनको भी तो अभी वर्तमान में कर्म का फल चाहिये। आखिर यह हो क्या रहा है?मजहबवादी,लोकतंत्रवादी, साम्यवादी,जडवादी, भौतिकवादी,समाजवादी,तानाशाहीवादी,नवयानवादी आदि सभी मेहनतकश जनमानस को समय पर न्याय और कर्म का फल देने में विफल रहे हैं। संसार में उल्टा ही हो रहा है।जो जितना अधिक मेहनतकश, सत्यनिष्ठ और संवेदनशील होगा,वह उतना ही अधिक गरीब,असहाय, बेरोजगार और प्रताड़ित मिलेगा। भौतिक हो आध्यात्मिक जगत् हो-उसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है।
5.)भारत पर अब्राहमिक विदेशी क्रूर,उज्जड और अनपढ़ हमलावरों तक ने जबरन शासन करने का कार्य किया है। यूरोपीय कुछ पढ़ें लिखे अवश्य रहे हैं। कासिम से लेकर माउंटबेटन तक सैकड़ों आततायी,क्रूर,पशुवत्, लूटेरे और नरसंहारी शासकों ने भारत में करोड़ों भारतीयों का कत्लेआम किया था।भारत के प्राचीन स्मारकों और विश्वविद्यालयों को नष्ट किया था। करोड़ों महिलाओं के साथ बलात्कार किये गये थे। करोड़ों बच्चों को मारकर उनका जश्न मनाया गया था।इस धरती पर ऐसा कोई भी अपराध और अनाचरण नहीं है,जो उन्होंने नहीं किया। अंग्रेजी कौम ने पौने दो सौ वर्षों तक भारत को आर्थिक रूप से कंगाल तो बनाया ही था, इसके साथ -साथ सनातन धर्म और संस्कृति के हजारों ग्रंथों की मनमानी व्याख्या करके भारतीयों को उनकी ही दृष्टि में नीचे गिराने का काम किया था।उनको उनके किये गये कुकर्म,पाप और अन्याय का फल कब और किसने प्रदान किया?वो आज भी सांसारिक रुप से भारतीयों से सैकड़ों गुना अधिक सुविधासंपन्न जीवन जी रहे हैं। इसके जवाब में कुछ सिरफिरे लोग भारतीयों को विश्वासघाती,रिश्वतखोर और राष्ट्रभक्ति से रहित होने के प्रवचन देने लगते हैं। वास्तविकता तो यह है कि भारतीयों ने अपनी भारतभूमि, अपने सनातन धर्म और संस्कृति, जीवन-मूल्यों, सनातनी प्रतीकों और ग्रंथों को बचाने के लिये जिस वीरता और पौरुष का परिचय दिया था,उसका दूसरा उदाहरण दुनिया में मौजूद नहीं है।कारण कुछ और रहे हैं,जिनकी चर्चा करने से सभी भय खाते हैं।
6.)मिशनरी दुष्प्रभाव के द्वारा भारतीयों का मन पिछले पौने दो सौ वर्षों के दौरान इस तरह से निर्मित कर दिया गया है कि ये धर्म और रिलीजन में अंतर करना ही भूल गये हैं।धर्म का रिलीजन या संप्रदाय या मत नहीं होकर इनसे बहुत व्यापक है।धर्म में अनेक संप्रदाय या मत या वाद हो सकते हैं, लेकिन रिलीजन की पाश्चात्य अवधारणा तो बिल्कुल ही सतही, भौतिक,उपयोगितावादी तथा अन्यों के प्रति घृणा और द्वेष की भावना से भरी हुई होती है। सांप्रदायिक या मतवादी या वादी व्यक्ति धर्म तक यात्रा कर सकता है, लेकिन रीलिजियस व्यक्ति कभी भी धर्म तक नहीं पहुंच सकता है।रिलीजन को तिलांजलि दिये बिना कोई व्यक्ति धार्मिक नहीं हो सकता।रीलिजियस व्यक्ति किसी एक पूजा पद्धति,एक मसीहा,एक पुस्तक को मानकर चलता है। इनके सिवाय वह किसी अन्य व्यक्ति की पूजा पद्धति, महापुरुष और ग्रंथ को स्वीकार नहीं करता है।रिलीजन में सिर्फ मानने की बात प्रधान होती, साधना द्वारा जानने की नहीं।वह यह कहता हुआ मिलेगा कि मैं यह यह मानता हूं, लेकिन धार्मिक व्यक्ति जिन कर्तव्यों और जीवनमूल्यों को मानने का दावा करता है,वह उनको अपने आचरण में भी उतारता है। धर्म में आचरण और साधना मुख्य होते हैं, जबकि रिलीजन में सिर्फ मानना ही काफी है। आचरण में उतारने की बात का कोई मूल्य नहीं होता है।दिखावा और ढोंग या मानना कुछ और करना उसके विपरीत – यह सिर्फ रिलीजन में होता है, धर्म में नहीं।रीलिजियस व्यक्ति को केवल अपने रिलीजन वालों को चिंता होती है तथा दूसरों को जैसे – तैसे अपने रिलीजन में सम्मिलित करना प्रयास रहता है। लोभ,प्रलोभन या डरा धमकाकर कन्वर्जन या मतांतरण करवाना इनके यहां मुख्य होता है। पिछली लगभग 16-17 शताब्दियों के दौरान अब्राहमिक मजहबियों ने अपने मजहब में करोड़ों लोगों का मतांतरण लोभ, प्रलोभन,छल, कपट और डरा धमकाकर तलवार के बल पर ही किया था। अपनी मर्जी से या शोषण से या गरीबी से या जातिवाद आदि से दुखी होकर मतांतरण करने की बातें राजनीतिक चालबाजी के सिवाय कुछ नहीं है। निहितार्थ यह है कि धर्म में अधिकार और कर्तव्य तथा कर्तव्यों के अनुकूल आचरण की प्रधानता मुख्य होती है। इसलिये धर्म कोई अवधारणा या सिद्धांत या राजनीतिक एजेंडा न होकर ऋत और सत्य के अनुसार जीवन जीना है। इसमें स्व- कल्याण के साथ पर- कल्याण भी आवश्यक होता है। रिलीजन या मजहब में केवल अपनी चिंता करना होता है। बाकी दुनिया का शोषण करके,उसको गुलाम बनाकर, उसको प्रताड़ित करके तथा हिंसा और युद्धोन्माद के बल पर दुनिया पर शासन करना होता है। अब्राहमिक मजहबी लोगों ने पिछली 16-17 शताब्दियों के कालखंड में यही सब किया है। इनके लिये किसी शाश्वत् और सर्व कल्याणकारी जीवनमूल्यों कोई महत्व नहीं है। ऐसे शोषक, लूटेरे और हिंसक प्रवृत्ति के लोगों, देशों और कंपनियों का सामना एक नैतिक, करुणामय, संवेदनशील और निष्काममार्गी व्यक्ति कैसे कर पायेगा?इस संदर्भ में उसकी कर्म के अनुसार फल मिलने की व्यवस्था कहां ठहरती है?
7.) रही बात ‘जैसे को तैसा जवाब देने की’ – तो इस नियम को हमारे यहां कौन मानता है?एक बार कभी जीवन में किसी के साथ इस तरह का व्यवहार करके देखना – पुलिस द्वारा तो पिटोगे ही, इसके साथ -साथ कानून हाथ में लेने के अपराध में जेल की हवा भी खाओगे। जिनके पास किसी प्रकार का बल है,वो तो ले -देकर बच जायेंगे, लेकिन बलहीन जनसाधारण को कोई भी बचाने नहीं आयेगा। यहां भी भौतिक संसार में कर्म और उसके अनुकूल कर्मफल मिलने की बात सही सिद्ध नहीं होती है।हालात ऐसे हैं कि बलवान व्यक्ति मनचाहा बुरा कर्म करके भी उसका मनचाहा अच्छा फल पाने की सामर्थ्य रखता है, जबकि बलहीन व्यक्ति मनचाहा अच्छा कर्म करके भी उसका अच्छा फल पाने में विफल रहता हुआ देखा जाता है। मेरा आशय इस संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता में दोष निकालने का न होकर श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों की मनमानी, तोड़-मरोड़कर और पूर्वाग्रहग्रस्त व्याख्या करके उसे अपनी आजीविका और स्वार्थ के लिये दुरुपयोग करने के बारे में है। श्रीमद्भगवद्गीता के कर्म और कर्मफल से संबंधित श्लोकों की व्याख्या हमारे विभिन्न तथाकथित विद्वान लोग कर रहे हैं,वो सभी जमीनी धरातल के विपरीत हैं। अपने चहुंओर दिन-रात हाड़तोड़ मेहनत करके गरीबी और बदहाली का जीवन जीने को अभिशप्त 80-90 करोड़ भारतवासियों को देखकर ही अपनी श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्याओं पर पुनर्विचार कर लेते।
8.) जिन श्रीमद्भगवद्गीता और सत्यार्थ प्रकाश को पढ़कर हजारों स्वतंत्रता सेनानी फांसी के फंदों पर झूल गये थे,आज के भारतीयों को क्या हो गया है? श्रीमद्भगवद्गीता भी यही है तथा सत्यार्थ प्रकाश भी यही है, लेकिन सिस्टम के भ्रष्टाचार,अन्याय,अधर्म, अनाचार, भेदभाव आदि से आज किसी का खून क्यों नहीं खौलता है?जिस तरह का भ्रष्ट और लूटेरा सिस्टम पहले था,वैसा ही आज भी है। स्वतंत्रता सेनानियों ने श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्म के उपदेश पर चलकर अपनी जिंदगियों को दांव पर लगा दिया था, लेकिन उनके बलिदान का फल न तो उस समय उन स्वतंत्रता सेनानियों को मिला था तथा न ही आज भारतवासियों को मिल रहा है। यदि श्रीमद्भगवद्गीता 17/13 श्लोक के अनुसार कर्म और फल के मध्य पांच कारकों में से एक ‘दैव’ या ‘भाग्य’ को भी ले लें तो भी समस्या का समाधान नहीं होता है। क्या 80-90 करोड़ मेहनतकश भारतीयों का भाग्य या दैव बिल्कुल खराब है तथा भारत के आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त हजारों अपराधी विधायकों, सांसदों, मंत्रियों, उच्च अधिकारियों, न्यायधीशों,रामरहीमों,रामपालदासों,नीरव मोदियों जैसे पचासों बैंक लूटेरों, पूंजीपतियों,कोरपोरेट्स और लाखों करोड़ों का कर्ज माफ़ होने वाले उद्योपतियों का भाग्य बहुत अच्छा है?कुछ तो तर्क और करुणा से काम लें लो। इतना निर्दयी और क्रूर होना भी ठीक नहीं है।
9.)हमारे आजकल के सभी गीताप्रेमी प्रचारक तथाकथित करोड़पति अरबपति महापुरुष श्रीमद्भगवद्गीता के द्वारा भारत ही नहीं अपितु सारी दुनिया की सभी समस्याओं का समाधान किये जाने के दावे करते रहते हैं।आप इनसे भारत में मौजूद विनाशकारी भ्रष्टाचार, अनाचार, दुराचार, बलात्कार, भेदभाव, छुआछूत, अनैतिकता, अधर्म, लूटपाट, घोटालों, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुशिक्षा, अब्राहमिक दुष्प्रभाव आदि का समाधान करवाकर दिखला दीजिये। फिर इनकी योग्यता पर किसी को कोई संदेह नहीं रहेगा तथा श्रीमद्भगवद्गीता के कर्म और फल की समस्या भी सुलझ जायेगी। पिछले आठ दशकों के दौरान त्राहि त्राहि करते हुये भारतवासियों की समस्यायों का समाधान करके के लिये श्रीमद्भगवद्गीता की पुस्तक लेकर कोई भी आगे नहीं आया है।इसका विपरीत अवश्य होता लग रहा है। श्रीमद्भगवद्गीता के द्वारा भारतवासियों की समस्यायों का समाधान तो नहीं हो सका है, लेकिन प्रचारक करोड़पति और अरबपति अवश्य बन गये हैं। इन्होंने अपनी सभी समस्याओं का समाधान अवश्य कर लिया है।
10.)यदि आपको कर्म करने की स्वतंत्रता है,तो आपकी नैतिक जिम्मेदारी भी आवश्यक हो जाती है। नैतिक जिम्मेदारी का आधार कर्म करने की स्वतंत्रता है। यदि आप स्वतंत्र नहीं हो तो आपकी न तो कोई नैतिक जिम्मेदारी बनती है तथा न ही आपको किये गये कर्मों का कोई फल ही मिलेगा। गुलामों की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं होती है तथा न ही उनको उनके द्वारा किये गये कर्मों का जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। महर्षि वेदव्यास ने भगवान् श्रीकृष्ण के मुखारविंद से कहलवाया है –
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संग: अस्तु अकर्मणि।।(गीता,2/47)
अर्थात् तेरा अधिकार कर्म करने में है, उसके फल में नहीं।तू कर्मफल का कारण भी मत बन तथा कर्म न करने से आसक्ति भी मत रख।
11.)किसी गुलाम और दास के द्वारा गुलामी और दासता में जो कर्म किसी मालिक द्वारा जबरदस्ती से करवाये जाते हैं,वह गुलाम या दास उनके फल का जिम्मेदार कैसे हो सकता है? क्योंकि कर्म अर्थ क्रिया नहीं होता है।कर्म में कर्ता की भावना, इच्छाशक्ति और विचार अवश्य जुड़े हुये होते हैं।जो व्यक्ति स्वतंत्र नहीं है,वह कर्म नहीं करता है अपितु वह क्रिया मात्र करता है। क्रिया को जड़ता या जड वस्तुओं से जोड़ा जाता है।सचेतन व्यक्ति का कर्म तभी कर्म कहलायेगा जब उसने वह कर्म किसी इच्छा, कामना, आकांक्षा या भावना से किया हो।पागल व्यक्तियों को इसीलिये उन द्वारा किये गये कर्मों की सजा माफ होती है। क्या उपरोक्त श्लोक इस संबंध में कुछ कहता है या नहीं? गीता के विद्वान तो यह कहते पाये जाते हैं कि आपने किसी भी अवस्था में कोई कर्म किया हो,उसका फल अवश्य मिलेगा। चाहे कर्म के साथ व्यक्ति की इच्छा, कामना, आकांक्षा आदि हो या न हो। मुझे तो लगता है कि कर्म के संबंध में गीता का मत आध्यात्मिक अधिक है तथा आचारशास्त्र का मत सांसारिक अधिक है। इन दोनों के घालमेल से गड़बड़ी होती है। और अक्सर गीता के प्रचारक यही गलती करते पाये जाते हैं। उन्हें यह मालूम ही नहीं है कि अनेक सांसारिक नियम आध्यात्मिक क्षेत्र में पीछे छूट जाते हैं।जो व्यक्ति पागल हैं तथा जिनको अपने किये गये अच्छे या बुरे कर्मों के प्रति कोई इच्छा, कामना, भावना आदि नहीं हैं,तो क्या उनको कर्मों का फल मिलेगा? सांसारिक न्यायालय की तरफ से तो ऐसे व्यक्तियों की चिकित्सा की सिफारिश की जायेगी,सजा देने की नहीं। गीता के विद्वान इस संबंध में सार्थक और तार्किक चर्चा करते हुये कम ही पाये जाते हैं। उनमें विषय को घूमा -फिराकर उत्तर देने से बचने के प्रयास अधिक देखे जाते हैं।
12.)महर्षि दयानंद सरस्वती ने अवतारवाद से संबंधित प्रस्तुत श्लोक पर टिप्पणी करते हुये सत्यार्थ प्रकाश में कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।(गीता,4/7)
उनके मतानुसार हो सकता है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने इस प्रकार का कथन धर्म, संस्कृति और राष्ट्र -रक्षा के प्रति समर्पित भावना से कहा हो,कि मैं इनके रक्षार्थ और अधर्मादि को मिटाने के लिये बार -बार जन्म लूंगा। जनमानस की हिम्मत बढ़ाने के लिये भी अक्सर महापुरुषों द्वारा इस प्रकार के वचन कहे जाते रहे हैं।साधुओं की सहायता करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की स्थापना करने के लिये मैं प्रत्येक युग में ऐसा कार्य करता हूं।
13.)आज विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, धर्माचार्यों और सुधारकों द्वारा अंधभक्तों की करोड़ों में आबादी पैदा हो गई है। इनके कर्म इनके आकाओं की प्रेरणा पर किये जाते हैं। इसमें इनकी स्वयं की कोई इच्छा, कामना और आकांक्षा नहीं होती है। अपने आकाओं के विरोध में कुछ भी सुनना या किया जाना इनके लिये असहनीय होता है। गीता में मौजूद कर्म और कर्मफल की व्यवस्था इस संबंध में क्या कहती है?इन द्वारा किये गये कर्मों का फल इनको अकेले को मिलेगा या इनके आकाओं को मिलेगा या दोनों को मिलेगा या किसी को नहीं मिलेगा? धर्माचार्य, सुधारक, कथाकार, योगाचार्य,नीतिशास्त्री आदि भी इसकी वास्तविकता को स्पष्ट नहीं करते हैं।कर्म का कर्ता,कर्म और फल आदि वास्तव में किसको कहा जाता है? लगता है कि जनमानस को कर्म और फल के जाल में उलझाये रखना ही इनका उद्देश्य है।ऐसी विषम परिस्थिति में ही जनमानस इनका कट्टर अंधभक्त और अंधानुयायी बनेगा।
14.) गीता में महर्षि वेदव्यास ने भगवान् श्रीकृष्ण के मुखारविंद से कहलवाया है कि कर्म की गति अति रहस्यमय है।इसको समझना इतना आसान नहीं है, जितना आसान जनसाधारण और विद्वतजन में इसको समझा जाता रहा है। उन्होंने कहा है –
कर्मणो ह्य अपि बोधव्यं बोधव्यं च विक्रमण:।
अकर्मणश् च बोधव्यं गहन कर्मणो गति।।(गीता,4/17)
अर्थात् कर्म को अवश्य ही समझा जाना चाहिये,समझा जाना चाहिये। विशेष कर्म और अकर्म को भी समझा जाना चाहिये।कर्म के रहस्य को समझना बहुत कठिन है।इस श्लोक के माध्यम से महर्षि वेदव्यास कर्म, कर्मफल,कर्मफल काल,कर्म और फल के मध्य अवरोध आदि की ओर संकेत कर रहे हैं। पाश्चात्य शैली में शिक्षा -संस्थानों में पढाये जाने वाले विषय ‘इथिक्स या नीतिशास्त्र’ में सतही जानकारी मिलती है। कर्म- तत्व को समझाने के लिये महाभारत के एक भाग कालजयी ग्रंथ ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के सामने पाश्चात्य संसार की कोई एक पुस्तक या सभी पुस्तकें एक साथ मिलकर भी नहीं ठहरती हैं।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119






